पटना: 1994 के चर्चित जी. कृष्णैया हत्याकांड में पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने एक बार फिर पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि ड्यूटी पर तैनात किसी लोक सेवक की हत्या को भी “दुर्लभतम अपराध” नहीं माना जाएगा, तो यह अपराधियों को गलत संदेश देगा।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान बिहार सरकार के फैसले पर कई तीखे सवाल उठाए और फिलहाल अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा—“अगर ड्यूटी पर तैनात अधिकारी की हत्या भी रेयरेस्ट ऑफ रेयर नहीं है, तो फिर आखिर क्या है?” इस टिप्पणी ने पूरे न्यायिक और प्रशासनिक तंत्र पर बहस छेड़ दी है।
मामला 5 दिसंबर 1994 का है, जब गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की भीड़ ने हत्या कर दी थी। इस मामले में आनंद मोहन को पहले फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। लेकिन बिहार सरकार ने 2023 में उन्हें समय से पहले रिहा कर दिया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
अदालत ने रिहाई की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। सुनवाई में सामने आया कि माफी बोर्ड को दी गई रिपोर्ट में लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई गई थी। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि “बोर्ड को गुमराह किया गया, हर अधिकारी एक ही दिशा में झुका नजर आया।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अच्छे आचरण, पैरोल या पारिवारिक पृष्ठभूमि जैसे कारणों के आधार पर गंभीर अपराधों में राहत देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है।
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो तय करेगा कि आनंद मोहन की रिहाई कानूनी रूप से सही थी या नहीं।