लखीसराय: 29 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय खेल दिवस और महान हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद जी की जयंती पर पूरे देश में खेल गतिविधियों का आयोजन होना था। बिहार सरकार के खेल निदेशालय ने भी दो आधिकारिक पत्र जारी कर जिला खेल पदाधिकारियों को निर्देश दिए थे। लेकिन लखीसराय में हकीकत कुछ और ही निकली।
जिला कबड्डी संघ के सचिव ने इन दोनों सरकारी पत्रों को आधार बनाकर जिलाधिकारी शैलेन्द्र कुमार और जिला खेल पदाधिकारी (प्रभारी) मुकुल पंकज मणि को आवेदन सौंपकर धूमधाम से आयोजन की मांग की। नतीजा? खानापूर्ति, बहानेबाजी और नदारद सरकारी मशीनरी।
पहला पत्र आया देर रात, दूसरा भी फॉर्मेलिटी
खेल निदेशालय का पहला पत्र 28 अगस्त की देर रात जिला को मिला। सुबह आवेदन पहुंचाने पर डीएम का जवाब था— “रात को मिला है, सुबह भेज रहे हो। 10 बजे ऑफिस बैठता हूं तो बताता हूं।” उसके बाद कोई जवाब नहीं आया। कोई निर्देश नहीं, कोई बैठक नहीं, कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं।
दूसरा पत्र भी 28 अगस्त को ही जारी हुआ, जिसमें 28 से 30 अगस्त तक फिट इंडिया के तहत मैदान में एक घंटा खेलने के कार्यक्रम का निर्देश था। शिक्षा विभाग के अधिकारी का जवाब और भी अजीब—“अवकाश में पत्र आया, अवकाश में ही समय सीमा खत्म हो गई।” यानी छुट्टी का बहाना बनाकर पूरी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया गया।
जिला खेल पदाधिकारी का ‘शामिल होने’ वाला जवाब
जिला परिवहन पदाधिकारी सह प्रभारी जिला खेल पदाधिकारी मुकुल पंकज मणि को आवेदन देने पर उन्होंने लिखा—“कार्यक्रम एरेंज कीजिए, मैं शामिल होऊंगा।” जिला कबड्डी संघ ने खेलो इंडिया स्मॉल कबड्डी ट्रेनिंग सेंटर, खगौर ग्राउंड पर बालक-बालिका कबड्डी का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया। 50 उदयीमान खिलाड़ियों को प्रोत्साहित भी किया गया। खेल पदाधिकारी कार्यक्रम शुरू होने से 15 मिनट पहले पहुंचे… और कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही गायब हो गए।
सरकारी स्तर पर जीरो गतिविधि
खगौर स्थित खेलो इंडिया सेंटर के अलावा पूरे जिले में न जिला प्रशासन ने कोई खेल गतिविधि कराई, न शिक्षा विभाग ने। न कोई प्रतियोगिता, न कोई जागरूकता अभियान, न स्कूल-कॉलेज स्तर पर कोई आयोजन। सरकारी निर्देश सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए।
देर से पत्र निकालना ‘खानापूर्ति’
29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाने का निर्देश 28 अगस्त की रात को भेजना और फिर 28-30 अगस्त के फिट इंडिया कार्यक्रम का सर्कुलर भी उसी दिन निकालना—यह साफ खानापूर्ति है। मेजर ध्यानचंद जैसी महान शख्सियत की जयंती को हास्यास्पद बना दिया गया। अगर लखीसराय में यह हाल है तो पूरे बिहार में क्या स्थिति रही होगी? खेल मंत्रालय और निदेशालय को कटघरे में खड़ा होना ही होगा।
लखीसराय की यह घटना पूरे राज्य के खेल प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। देर से पत्र, बहानेबाजी, मैदान में नदारद अधिकारी और सिर्फ कागजी निर्देश—क्या यही है बिहार में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने का तरीका?
ये खबर भी पढ़े: नेपाल में कुदरत का कहर, 903 शव मिले, 4,247 अब भी लापता; 10,451 लोगों को बचाया!
