रांची: झारखंड के लिए खनिज सिर्फ जमीन के नीचे दबा संसाधन नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था और अधिकारों का बड़ा आधार है। यही वजह है कि MMDR संशोधन को लेकर अब सियासी तापमान तेजी से बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विरोध के बाद मामला सरकार से निकलकर सत्तारूढ़ JMM के संगठन तक पहुंच गया है। 20 अगस्त को होने वाली पार्टी की विस्तारित बैठक में अब यह तय होना है कि दिल्ली के फैसले के खिलाफ झारखंड की आवाज कितनी दूर तक जाएगी।
बयान से आगे बढ़कर आंदोलन की तैयारी
अब तक मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के सामने पत्र और सार्वजनिक बयानों के जरिए अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। लेकिन 20 अगस्त की बैठक के बाद तस्वीर बदल सकती है। JMM अपने विधायकों, मंत्रियों और जिलास्तरीय संगठन को एक साथ जुटाकर इस मुद्दे को राजनीतिक अभियान में बदलने की तैयारी में है।
यानी लड़ाई अब सिर्फ केंद्र बनाम राज्य सरकार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे JMM बनाम केंद्र की नीतियों के रूप में जनता के बीच ले जाने की रणनीति बन सकती है।
11 हजार करोड़ ने बढ़ाई चिंता
इस पूरे विवाद के केंद्र में करीब 11 हजार करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का मुद्दा भी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में Mineral Bearing Land Cess से होने वाली संभावित आय का जिक्र करते हुए राज्य की वित्तीय स्थिति पर चिंता जताई है।
सरकार का तर्क है कि खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व पर असर पड़ा तो इसका सीधा प्रभाव राज्य की विकास योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर पड़ सकता है।
कोल्हान से उठेगा पहला बड़ा राजनीतिक स्वर?
JMM ने कोल्हान क्षेत्र में भी इस मुद्दे पर अभियान की तैयारी शुरू कर दी है। राजनीतिक रूप से यह क्षेत्र JMM के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि पार्टी यहां से बड़े जनसंपर्क अभियान की शुरुआत करती है, तो MMDR संशोधन आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति का नया मुद्दा बन सकता है।
विधानसभा का विशेष सत्र भी अगला पड़ाव
सरकार की तरफ से विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का संकेत पहले ही दिया जा चुका है। ऐसे में JMM की संगठनात्मक रणनीति और विधानसभा में सरकार की रणनीति एक-दूसरे के समानांतर चलती दिखाई दे रही है।
एक तरफ सदन में संशोधन के प्रभाव पर चर्चा की तैयारी है, तो दूसरी तरफ सड़क पर आंदोलन की जमीन तैयार करने की कोशिश। यही वजह है कि 20 अगस्त की बैठक को महज संगठनात्मक बैठक नहीं, बल्कि JMM के अगले राजनीतिक अभियान की लॉन्चिंग के तौर पर देखा जा रहा है।
असली सवाल अब यह है…
MMDR संशोधन के खिलाफ JMM कितना बड़ा आंदोलन खड़ा करता है और क्या यह मुद्दा झारखंड की राजनीति में ‘झारखंड के अधिकार बनाम केंद्र के अधिकार’ की नई बहस को जन्म देगा—इसका संकेत गुरुवार की बैठक के बाद मिल सकता है।
फिलहाल इतना साफ है कि खनिज अधिकार का मुद्दा अब फाइलों और पत्रों से निकलकर सियासी मैदान में पहुंच चुका है।
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