गोपालगंज: बिहार के गोपालगंज जिले में शिक्षा विभाग के एक मामले ने नियुक्ति प्रक्रिया और सरकारी राशि के भुगतान की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मांझा प्रखंड के नवसृजित प्राथमिक विद्यालय, रूपनछाप कर्णपुरा से जुड़ी शिक्षिका खुशबू कुमारी के खाते में कथित तौर पर वेतन एरियर के रूप में 17 लाख 49 हजार 507 रुपये भेजे गए। विभागीय रिकॉर्ड और अधिकारियों के सामने आए सवालों के मुताबिक, शिक्षिका के योगदान और नियुक्ति की वैधता को लेकर विवाद है।
बताया गया है कि यह राशि 26 मई को उनके बैंक खाते में ट्रांसफर की गई थी। अब जांच का मुख्य बिंदु यही है कि जब शिक्षिका के योगदान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी, तो उनके खाते में इतनी बड़ी रकम किस आधार पर भेजी गई और भुगतान की प्रक्रिया में किन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका रही।
17.49 लाख के भुगतान पर सबसे बड़ा सवाल
इस मामले में शिक्षा विभाग के सामने कई अहम सवाल हैं। क्या भुगतान से पहले नियुक्ति और योगदान से जुड़े दस्तावेजों की विधिवत जांच की गई थी? भुगतान की स्वीकृति किस स्तर पर दी गई? ई-शिक्षा कोष पोर्टल पर संबंधित प्रविष्टि किसने दर्ज कराई और उसे प्रमाणित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
विभागीय जानकारी के अनुसार, स्थापना शाखा ने 13 अक्टूबर को विद्यालय के तत्कालीन प्रभारी प्रधानाध्यापक मनोज कुमार चौधरी को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा था। उनसे यह बताने को कहा गया कि जब उनके स्तर से खुशबू कुमारी का योगदान स्वीकार नहीं किया गया था, तो ई-शिक्षा कोष फॉर्म पर हस्ताक्षर और उससे संबंधित प्रविष्टि की अनुमति कैसे दी गई।
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही भुगतान की प्रक्रिया और जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।
नियुक्ति पत्र की वैधता पर भी उठे सवाल
विभागीय रिकॉर्ड में शिक्षिका का यू-डायस कोड 10151109 और शिक्षक आईडी 1521602100068 दर्ज होने की जानकारी दी गई है। उनकी नियुक्ति कर्णपुरा पंचायत के नियोजन प्राधिकार की ओर से 4 फरवरी 2016 को जारी आदेश के आधार पर बताई गई है।
हालांकि, पंचायत के तत्कालीन मुखिया अवधेश कुमार ने कथित तौर पर ऐसी किसी नियुक्ति की जानकारी होने से इनकार किया है। इस बयान के बाद नियुक्ति आदेश और उससे संबंधित दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच महत्वपूर्ण हो गई है।
अब यह पता लगाना जरूरी है कि नियुक्ति पत्र वास्तविक है या नहीं, नियोजन प्रक्रिया के अभिलेखों में संबंधित शिक्षिका का नाम दर्ज है या नहीं और विभागीय स्तर पर उपलब्ध दस्तावेजों का आपस में मिलान होता है या नहीं।
सुनवाई में उपस्थित नहीं हुईं शिक्षिका
मामले की जांच के क्रम में डीपीओ स्थापना विनय कुमार सुमन ने शिक्षिका खुशबू कुमारी को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने और नियुक्ति से जुड़े मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा था।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पटना हाईकोर्ट के 12 जनवरी 2026 के आदेश के अनुपालन में डीपीओ कार्यालय में 21 सितंबर से सुनवाई शुरू की गई थी। शिक्षिका को दस्तावेज जमा करने के लिए 7 अक्टूबर तक का समय दिया गया था, लेकिन वह निर्धारित सुनवाई में उपस्थित नहीं हुईं।
शिक्षिका की अनुपस्थिति से जांच में उठे सवालों का समाधान नहीं हो सका है। हालांकि, सुनवाई में उपस्थित नहीं होना अपने आप में किसी आरोप को साबित नहीं करता। मामले में उनका पक्ष सामने आना भी जरूरी है।
जांच पूरी होने के बाद प्राथमिकी की तैयारी
जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र कुमार पांडेय के अनुसार, पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच चल रही है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने और कथित अनियमितता में संलिप्त लोगों की पहचान होने के बाद प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि भुगतान किस प्रक्रिया के तहत हुआ, दस्तावेजों में कोई हेराफेरी हुई या नहीं और यदि वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होती है, तो इसके लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं।
अब विभागीय जवाबदेही की परीक्षा
इस प्रकरण ने सरकारी विद्यालयों में नियुक्ति संबंधी रिकॉर्ड, शिक्षक योगदान और वेतन भुगतान की प्रक्रिया की निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं। यदि बिना वैध नियुक्ति या योगदान के सरकारी राशि का भुगतान किए जाने की पुष्टि होती है, तो यह गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला हो सकता है।
फिलहाल विभागीय जांच के नतीजे सामने आने बाकी हैं। जांच रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगा कि 17.49 लाख रुपये का भुगतान किन परिस्थितियों में हुआ और इस मामले में किसकी जिम्मेदारी तय होती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब नियुक्ति और योगदान को लेकर विवाद था, तो भुगतान की प्रक्रिया में जरूरी सत्यापन कैसे हुआ? इसका जवाब विभागीय जांच और संबंधित रिकॉर्ड से ही मिल सकेगा।
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गोपालगंज से अनुज पांडेय की रिपोर्ट…