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Bihar: शराबबंदी हटेगी? इस सवाल पर बिहार सरकार का जवाब सुनकर आप भी चौंक जाएंगे!

पटना: बिहार की राजनीति में शराबबंदी एक बार फिर बहस के केंद्र में है। एक तरफ राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद...

पटना: बिहार की राजनीति में शराबबंदी एक बार फिर बहस के केंद्र में है। एक तरफ राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) की रिपोर्ट में राज्य की आर्थिक रफ्तार बढ़ाने के लिए शराबबंदी कानून को खत्म करने की सिफारिश का दावा सामने आया है, तो दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने गुजरात की तर्ज पर शराबबंदी को और सख्ती से लागू करने की बात कही है। इन विरोधी राय के बीच बिहार सरकार ने फिलहाल अपना रुख साफ रखा है—शराबबंदी हटाने का सवाल ही नहीं।

सवाल यह है कि आखिर आर्थिक नुकसान और राजस्व के तर्क के बावजूद सरकार शराबबंदी को लेकर इतनी सख्त क्यों है?

कानून हटाया तो सियासी समीकरण बिगड़ सकता है

बिहार में शराबबंदी सिर्फ कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रही है। वर्ष 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू किए जाने के पीछे घरेलू हिंसा समेत सामाजिक समस्याओं को कम करने का तर्क दिया गया था।

अब इसके समर्थकों का कहना है कि शराब की खपत में गिरावट के आंकड़े इस नीति के सामाजिक प्रभाव को दिखाते हैं। वहीं आलोचक राजस्व नुकसान, अवैध शराब के कारोबार और तस्करी जैसे सवाल उठा रहे हैं।

यही विरोधाभास शराबबंदी को बिहार की राजनीति का ऐसा मुद्दा बना देता है, जिसे कोई भी सरकार आसानी से छेड़ना नहीं चाहती।

NCAER की रिपोर्ट ने छेड़ी नई बहस

NCAER के ‘इंडिया पॉलिसी फोरम-2026’ से जुड़े शोध में बिहार की अर्थव्यवस्था को लेकर शराबबंदी हटाने और आबकारी राजस्व को दोबारा शुरू करने की सिफारिश का उल्लेख सामने आया है। तर्क दिया गया कि राज्य में भूमि आधारित राजस्व की संभावनाएं सीमित हैं और वस्तुओं एवं सेवाओं पर कर के साथ आबकारी राजस्व आर्थिक संसाधन बढ़ाने का एक माध्यम हो सकता है।

रिपोर्ट में शराबबंदी के बाद राजस्व पर पड़े प्रभाव और अवैध शराब की निगरानी पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि, शराबबंदी के समर्थकों का तर्क है कि किसी नीति की सफलता का आकलन केवल सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से भी किया जाना चाहिए।

मांझी ने दिया ‘गुजरात मॉडल’ का सुझाव

केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने बिहार में शराबबंदी को हटाने के बजाय गुजरात मॉडल की तर्ज पर इसे अधिक प्रभावी तरीके से लागू करने की बात कही है। यानी बहस सिर्फ ‘शराबबंदी रहे या हटे’ तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल यह भी है कि कानून जमीन पर कितना प्रभावी है।

आंकड़े दोनों पक्षों को दे रहे हैं तर्क

शराबबंदी के समर्थक NFHS के आंकड़ों का हवाला देते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार में 15-49 वर्ष आयु वर्ग के पुरुषों में शराब सेवन का प्रतिशत NFHS-4 के 28.9 प्रतिशत से घटकर NFHS-5 में 17 प्रतिशत और NFHS-6 में 16.5 प्रतिशत बताया गया है।

दूसरी तरफ शराबबंदी के आलोचक सवाल उठाते हैं कि यदि कानून प्रभावी है तो अवैध शराब, तस्करी और जहरीली शराब की घटनाएं पूरी तरह क्यों नहीं रुकीं।

यानी तस्वीर एकतरफा नहीं है।

सरकार के लिए सबसे बड़ा सवाल ‘राजस्व’ नहीं, ‘राजनीति’?

बिहार में महिला मतदाताओं की बड़ी भूमिका को देखते हुए शराबबंदी का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। नीति के समर्थक मानते हैं कि शराबबंदी ने महिलाओं के बीच सरकार की स्वीकार्यता बढ़ाई है। यही कारण है कि सत्ता पक्ष के लिए इस कानून में बदलाव राजनीतिक रूप से जोखिम भरा फैसला माना जा रहा है।

वहीं शराबबंदी हटाने का वादा कर चुनावी राजनीति में उतरने वाले नेताओं के प्रदर्शन को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आती रही हैं।

फिलहाल फैसला साफ—शराबबंदी जारी रहेगी

आर्थिक विशेषज्ञ शराबबंदी के राजस्व प्रभाव पर बहस कर सकते हैं, विपक्ष सवाल उठा सकता है और रिपोर्ट कानून की समीक्षा का सुझाव दे सकती है। लेकिन सरकार का मौजूदा रुख स्पष्ट है।

बिहार में शराबबंदी फिलहाल जारी रहेगी।

अब असली चुनौती यह है कि सरकार इस कानून को सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि अवैध शराब, तस्करी और समानांतर कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण के साथ जमीन पर कितना सफल बना पाती है।

क्योंकि बिहार में शराबबंदी की बहस अब सिर्फ ‘शराब मिले या न मिले’ की नहीं रही—यह अर्थव्यवस्था, सामाजिक बदलाव और सत्ता के सियासी गणित, तीनों का सवाल बन चुकी है।

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Mahuaa News

Author at mahuaanews.com
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