पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी अब राज्य में बड़े संगठनात्मक बदलाव की तैयारी में जुट गई है। 61 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद केवल 6 सीटों पर जीत मिलने से पार्टी नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस हार की जिम्मेदारी प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम पर तय की जा रही है। ऐसे में दोनों नेताओं की छुट्टी लगभग तय मानी जा रही है।
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पार्टी अब केवल नुकसान की भरपाई नहीं, बल्कि पूरे संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके तहत जिलाध्यक्षों से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी तक में बदलाव की योजना बनाई गई है। बताया जा रहा है कि अगले तीन महीनों के भीतर संगठनात्मक ढांचे में व्यापक फेरबदल किया जाएगा।
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दो महीने तक चले मंथन के बाद कांग्रेस नेतृत्व एक्शन मोड में आ गया है। राष्ट्रीय स्तर पर हुई बैठकों में हारे-जीते प्रत्याशियों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं से फीडबैक लिया गया। इन बैठकों में यह बात सामने आई कि राज्य नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की कमी रही, पार्टी अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरण से भटक गई और राजद के साथ गठबंधन से कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा।
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इन्हीं बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने बिहार में संगठनात्मक सर्जरी का फैसला किया है। पार्टी अब EBC और OBC केंद्रित राजनीति से हटकर अपने पुराने सामाजिक आधार—भूमिहार, ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम—पर दोबारा फोकस करेगी। जातीय सर्वे के अनुसार ये वर्ग मिलकर राज्य की करीब 44 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। कांग्रेस का मानना है कि इसी सामाजिक समीकरण के दम पर पार्टी ने 1990 तक बिहार की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाए रखी थी।
सूत्रों के मुताबिक, संगठन में बदलाव की शुरुआत जिलाध्यक्षों से होगी। इसके लिए पार्टी ने 29 नेशनल ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं, जो जिलों में जाकर कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे और नामों की सिफारिश करेंगे। फरवरी के अंतिम सप्ताह तक नए जिलाध्यक्षों की घोषणा किए जाने की संभावना है। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष और जून से पहले नए प्रदेश प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है।
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नए फॉर्मूले के तहत प्रदेश अध्यक्ष पद किसी सवर्ण नेता को सौंपे जाने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि एक मुस्लिम सांसद ने भी इस पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की है। वहीं संगठन में दलितों की भागीदारी बढ़ाने पर भी पार्टी का विशेष जोर रहेगा।
चुनाव के बाद कांग्रेस अब पप्पू यादव से दूरी बना सकती है, क्योंकि उनके साथ तालमेल से अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला। इसके विपरीत युवा नेता कन्हैया कुमार का बिहार में कद बढ़ सकता है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी के तहत कन्हैया कुमार को राज्य में बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी दी जा सकती है।
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कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि बिहार में अगले चार वर्षों तक कोई बड़ा चुनाव नहीं होने से संगठन को मजबूत करने का यह सबसे उपयुक्त समय है। पार्टी राजद के सहारे राजनीति करने के बजाय आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। आने वाले महीनों में होने वाले ये बदलाव बिहार की राजनीति में कांग्रेस की नई दिशा और रणनीति तय कर सकते हैं।