राजधानी पटना में गुरुवार को हुई समीक्षा बैठक सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं रही, बल्कि यह राज्य के खेल सिस्टम को आईना दिखाने वाली सख्त चेतावनी बन गई। बिहार राज्य खेल प्राधिकरण के मंच से साफ संदेश दिया गया—अगर जमीनी स्तर पर खेल प्रतिभाओं को तराशने में ढिलाई हुई, तो जवाबदेही तय होगी।
बैठक की अध्यक्षता महानिदेशक सह सीईओ रवीन्द्रण शंकरण ने की, जहां 100 से ज्यादा प्रशिक्षकों की मौजूदगी में उनके कामकाज की गहन समीक्षा की गई। एकलव्य खेल प्रशिक्षण केंद्रों और खेलो इंडिया स्मॉल सेंटर से जुड़े कोचों को सीधे तौर पर बताया गया कि अब “रिपोर्ट” नहीं, “रिजल्ट” चाहिए।
सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत राज्य में 64 एकलव्य आवासीय खेल प्रशिक्षण केंद्र और 30 से अधिक स्मॉल सेंटर चल रहे हैं, लेकिन सवाल यही है—क्या इन केंद्रों से वह स्तर का खिलाड़ी निकल रहा है जिसकी उम्मीद की गई थी?
बैठक में कई प्रशिक्षकों ने जमीनी समस्याएं रखीं—संसाधनों की कमी, सुविधाओं में सुधार की जरूरत—लेकिन शीर्ष स्तर से साफ कर दिया गया कि अब बहाने नहीं चलेंगे। खिलाड़ियों के भोजन, आवासन और ट्रेनिंग में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।
सिस्टम पर सीधा सवाल
अगर करोड़ों खर्च के बाद भी खिलाड़ी तैयार नहीं हो रहे, तो जिम्मेदार कौन? क्या केवल योजनाएं बनाना काफी है, या अब जमीन पर परिणाम भी दिखना चाहिए?
खेल प्राधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि इन केंद्रों से निकलने वाले खिलाड़ी ही भविष्य में राज्य और देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। ऐसे में प्रशिक्षकों की भूमिका सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है—और अब इस जिम्मेदारी का हिसाब भी लिया जाएगा।
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