मोतिहारी: बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में शिक्षा विभाग से सरकारी राशि की कथित लूट का बड़ा मामला सामने आया है। जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में शिक्षकों के वेतन भुगतान के लिए इस्तेमाल होने वाले HRMS पोर्टल को कथित तौर पर सरकारी खजाने की रकम निकालने का जरिया बना लिया गया। आरोप है कि जून 2024 से सितंबर 2026 तक बिना किसी वास्तविक शिक्षक के नाम पर, डाटा ऑपरेटरों ने अपने और अपने परिजनों के बैंक खातों में सरकारी राशि भेजी। इस पूरे मामले में 60 लाख रुपये से अधिक की सरकारी राशि के कथित गबन का खुलासा हुआ है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन गिरी ने नगर थाना में दो कथित डाटा ऑपरेटरों इमामुद्दीन शाबिर और अमन कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। दोनों आरोपितों के फरार होने की बात सामने आई है। मोतिहारी पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी के लिए प्रत्येक आरोपित पर 10-10 हजार रुपये के इनाम की घोषणा की है।
शिक्षकों के वेतन पोर्टल से कथित फर्जीवाड़ा, दो साल तक कैसे चलता रहा खेल?
बताया जा रहा है कि जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय के HRMS पोर्टल के माध्यम से जिले के शिक्षकों का वेतन भुगतान किया जाता है। आरोप है कि इसी पोर्टल का दुरुपयोग कर जून 2024 से सितंबर 2026 तक फर्जी तरीके से सरकारी राशि अलग-अलग बैंक खातों में भेजी जाती रही। जिन लोगों के नाम पर भुगतान किया गया, उनके वास्तविक शिक्षक होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। कथित तौर पर राशि डाटा ऑपरेटरों के अपने खातों और उनके परिजनों के खातों तक पहुंचाई गई।
इस मामले का खुलासा जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन गिरी ने किया। इसके बाद नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई और पुलिस ने आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित किया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस पोर्टल से हर महीने शिक्षकों का वेतन भुगतान होता है, उसी के जरिए इतने लंबे समय तक कथित फर्जी भुगतान कैसे होता रहा? भुगतान की प्रक्रिया में सत्यापन और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी?
दो डाटा ऑपरेटर नामजद, लेकिन निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण को लेकर शिक्षा विभाग से जुड़े लोगों और स्थानीय शिक्षा प्रेमियों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि जून 2024 से सितंबर 2026 के बीच स्थापना शाखा में अलग-अलग समय पर अखिल वैभव, गोपाल कृष्ण और वर्तमान में स्थापना शाखा के प्रभारी पदाधिकारी ब्रजेश कुमार पदस्थापित रहे हैं। इस अवधि में HRMS पोर्टल के माध्यम से कथित फर्जी भुगतान का मामला सामने आया है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने लंबे समय तक हुए भुगतान की निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी? क्या नियमित रूप से बैंक खातों, भुगतान सूची और शिक्षकों के सेवा रिकॉर्ड का मिलान किया गया था? क्या फर्जी भुगतान से जुड़े संकेतों की कभी जांच हुई? हालांकि, संबंधित अधिकारियों की संलिप्तता को लेकर फिलहाल कोई प्रमाण सामने नहीं आया है और न ही उनके खिलाफ कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी उपलब्ध है। इसलिए उनकी भूमिका की जांच और जवाबदेही तय होना जरूरी है।
जिन खातों में गई सरकारी राशि, उनकी भी हो जांच
इस मामले में सिर्फ नामजद आरोपितों की गिरफ्तारी ही पर्याप्त नहीं होगी। कथित तौर पर जिन बैंक खातों में सरकारी राशि भेजी गई, उन सभी खातों की जांच, भुगतान की पूरी सूची, लाभार्थियों की पहचान और राशि के लेन-देन का विवरण सामने आना चाहिए। यदि सरकारी राशि परिजनों या अन्य लोगों के खातों में भेजी गई है, तो यह भी जांच का विषय है कि उन्हें भुगतान की जानकारी थी या नहीं और उनकी क्या भूमिका रही।
बड़ा सवाल: 60 लाख से अधिक की राशि का हिसाब कौन देगा?
मोतिहारी शिक्षा विभाग में सामने आया यह मामला केवल दो डाटा ऑपरेटरों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जून 2024 से सितंबर 2026 तक कथित तौर पर फर्जी भुगतान होता रहा, तो इसकी प्रशासनिक और तकनीकी निगरानी की जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। क्या केवल डाटा ऑपरेटरों पर कार्रवाई कर पूरे मामले का पटाक्षेप कर दिया जाएगा, या भुगतान को मंजूरी देने, सत्यापन करने और निगरानी रखने वाले स्तरों की भी जांच होगी?
जिले के लोगों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और गहराई से जांच हो, सरकारी राशि पाने वाले सभी खातों का पता लगाया जाए और जांच में जिसकी भी भूमिका सामने आए, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। अब देखना होगा कि पुलिस और शिक्षा विभाग इस कथित घोटाले की तह तक कब पहुंचते हैं और सरकारी खजाने को हुए नुकसान की भरपाई कैसे कराई जाती है।
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