साहिबगंज: झारखंड के पत्थर खनन और स्टोन क्रशर कारोबार से जुड़े अहम मामले में गुरुवार को एक बार फिर अंतिम फैसला नहीं हो सका। हाईकोर्ट में सुनवाई टलने के बाद अब कारोबारियों, प्रशासन और पर्यावरण से जुड़े लोगों की नजर अगली तारीख पर टिक गई है। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत वन भूमि की सीमा से पत्थर खनन के लिए 500 मीटर और स्टोन क्रशर के लिए 400 मीटर की न्यूनतम दूरी का नियम प्रभावी है।
250 मीटर के नियम पर कोर्ट ने उठाए सवाल
मामले की जड़ 2015 और 2017 में जारी उन अधिसूचनाओं से जुड़ी है, जिनके जरिए वन और वनभूमि के आसपास पत्थर खनन एवं क्रशर के लिए पहले से लागू 400/500 मीटर की दूरी को घटाकर 250 मीटर किया गया था।
हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 के आदेश में इस व्यवस्था पर अंतरिम स्तर पर हस्तक्षेप करते हुए पुरानी स्थिति बहाल कर दी। कोर्ट ने कहा कि पत्थर खनन के लिए 500 मीटर और स्टोन क्रशर के लिए 400 मीटर की दूरी लागू रहेगी। यह व्यवस्था याचिका के अंतिम निस्तारण तक प्रभावी रहने की बात आदेश में कही गई है।
पूरे झारखंड के लिए महत्वपूर्ण मामला
यह विवाद केवल साहिबगंज तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश में वन और वनभूमि के संबंध में राज्य स्तर पर दूरी के नियम की बात है। इसलिए इसका असर झारखंड के उन इलाकों पर पड़ सकता है जहां वन क्षेत्र के आसपास पत्थर खनन या क्रशर गतिविधियां संचालित होती हैं।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सभी प्रभावित खदानों या क्रशरों के लाइसेंस स्वतः रद्द हो जाएंगे। वास्तविक प्रभाव संबंधित इकाई की दूरी, पर्यावरणीय अनुमति, वैध सहमति और अन्य लागू कानूनी शर्तों के आधार पर तय होगा।
कारोबारियों में चिंता, पर्यावरण पक्ष में उम्मीद
500-400 मीटर की व्यवस्था बहाल होने के बाद पत्थर कारोबार से जुड़े लोगों के बीच चिंता बढ़ी है। दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का तर्क है कि वन क्षेत्रों के आसपास खनन और क्रशर गतिविधियों पर कड़े मानक पर्यावरणीय नुकसान को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं।
हाईकोर्ट के आदेश में भी 250 मीटर की व्यवस्था को लेकर गंभीर प्रथमदृष्टया सवाल दर्ज किए गए हैं और पुराने 500/400 मीटर मानक को अंतरिम तौर पर बहाल किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा था मामला
इस विवाद का असर इतना व्यापक रहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा। जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष झारखंड हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हाईकोर्ट को अंतिम आदेश पारित करने देने की बात कही और हस्तक्षेप नहीं किया।
अब अगली सुनवाई पर टिकी नजर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि हाईकोर्ट अंतिम सुनवाई में 500 मीटर और 400 मीटर की व्यवस्था को बरकरार रखता है, उसमें बदलाव करता है या मामले में कोई अलग दिशा-निर्देश जारी करता है।
यानी पत्थर कारोबार के लिए फिलहाल राहत भी पूरी नहीं और संकट भी पूरी तरह टला नहीं है। अंतरिम व्यवस्था कायम रहने के कारण जंगलों के आसपास खनन और क्रशर गतिविधियों पर कानूनी निगरानी बनी हुई है।
हाईकोर्ट के 16 अप्रैल के आदेश के अनुसार, अंतिम फैसला आने तक पत्थर खनन और क्रशर के लिए 500/400 मीटर वाली दूरी व्यवस्था लागू रहेगी।
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