पटना: चुनाव से पहले 125 यूनिट मुफ्त बिजली देकर आम परिवारों को राहत का भरोसा दिलाने वाली बिहार सरकार अब उसी योजना को लेकर लोगों से स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने की अपील कर रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आर्थिक रूप से सक्षम और आयकर देने वाले लोगों से मुफ्त बिजली का लाभ छोड़कर राज्य के विकास में योगदान देने की बात कही है। सरकार इसे शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, लेकिन इस अपील ने आम उपभोक्ताओं के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल यह है कि जब सरकार ने मुफ्त बिजली योजना लागू की थी, तब क्या उसे इसके खर्च का अंदाजा नहीं था? अगर योजना पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च होने हैं, तो चुनाव से पहले इसका वित्तीय आकलन क्यों नहीं किया गया? और अब जब सरकारी खजाने पर दबाव की चर्चा हो रही है, तो इसकी कीमत आम जनता से सब्सिडी छोड़ने की अपील करके क्यों वसूली जा रही है?
चुनाव से पहले हर घर को राहत, अब खर्च का हवाला
17 जुलाई 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को हर महीने 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की घोषणा की थी। 1 अगस्त 2025 से यह योजना लागू भी हो गई। उस समय इसे आम परिवारों को राहत देने वाला बड़ा फैसला बताया गया था। बिजली बिल में बचत से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को घरेलू खर्च संभालने में मदद मिलने लगी।
लेकिन अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अपील के बाद योजना की निरंतरता को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। सरकार ने अभी मुफ्त बिजली बंद करने का कोई आदेश जारी नहीं किया है, फिर भी सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में इस योजना की शर्तें बदली जा सकती हैं?
जनता पूछ रही है- योजना बनाने से पहले हिसाब क्यों नहीं लगाया?
मुफ्त बिजली का लाभ लेने वाले उपभोक्ताओं के लिए यह केवल सरकारी सुविधा नहीं, बल्कि हर महीने के घरेलू बजट से जुड़ी राहत है। खासकर उन परिवारों के लिए, जिनकी आमदनी सीमित है और जिनके लिए बिजली बिल में होने वाली बचत भी मायने रखती है।
सरकार का कहना है कि संपन्न लोग स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ें, ताकि बची हुई राशि शिक्षा पर खर्च की जा सके। लेकिन जनता का सवाल है कि शिक्षा सुधारने की जिम्मेदारी सरकार की है और इसके लिए बजट की व्यवस्था करना भी सरकार का ही काम है। क्या विकास के लिए संसाधन जुटाने का रास्ता केवल जनता को मिलने वाली राहत छोड़ने से ही निकलेगा?
अगर सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव है, तो उसे खर्च और आमदनी का पूरा हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। किन मदों में खर्च बढ़ा है, किन योजनाओं पर कितना पैसा खर्च हो रहा है और बिजली सब्सिडी का वास्तविक बोझ कितना है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब जरूरी है।
23 हजार करोड़ के खर्च पर सवाल, लेकिन जवाबदेही किसकी?
मुख्यमंत्री की अपील के साथ बिजली सब्सिडी पर सालाना करीब 23 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का आंकड़ा भी चर्चा में है। यह बड़ी रकम है, इसलिए सरकार को इस खर्च का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए। लेकिन केवल खर्च का आंकड़ा बताकर आम उपभोक्ताओं से सब्सिडी छोड़ने की अपील करना पर्याप्त नहीं है।
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि मुफ्त बिजली योजना से किन वर्गों को कितना लाभ मिल रहा है और इसके खर्च का प्रबंधन किस तरह किया जा रहा है। यदि योजना लागू करते समय वित्तीय बोझ का अनुमान था, तो उसके लिए बजट में क्या व्यवस्था की गई थी? और यदि अनुमान से अधिक खर्च हो रहा है, तो इसकी वजह क्या है?
सक्षम लोगों से अपील ठीक, लेकिन आम जनता की राहत पर नजर क्यों?
आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने की अपील करना सरकार का नीतिगत विकल्प हो सकता है। लेकिन इस अपील के बहाने गरीब और मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं की राहत पर किसी तरह का असर नहीं पड़ना चाहिए।
सरकार को साफ करना होगा कि 125 यूनिट मुफ्त बिजली की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी या भविष्य में इसमें कोई बदलाव प्रस्तावित है। जनता को अस्पष्ट संकेतों के बजाय स्पष्ट आश्वासन और लिखित सरकारी नीति चाहिए।
जनता को वादे नहीं, राहत की निरंतरता चाहिए
बिहार के उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुफ्त बिजली योजना आगे भी पहले की तरह जारी रहेगी या नहीं। चुनाव के समय जिस सुविधा को बड़ी राहत के रूप में पेश किया गया था, उसके भविष्य को लेकर अब असमंजस पैदा नहीं होना चाहिए।
सरकार को यह समझना होगा कि आम परिवारों के लिए 125 यूनिट मुफ्त बिजली केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खर्च में मिलने वाली राहत है। यदि सरकार इसे जारी रखना चाहती है, तो उसे स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। यदि नियम बदलने की कोई योजना है, तो उसका कारण, असर और विकल्प जनता के सामने रखना चाहिए।
जनता का सवाल सीधा है—चुनाव से पहले राहत देने का वादा किया गया था, तो अब उस राहत का बोझ जनता पर डालने जैसी स्थिति क्यों बन रही है? सरकार को अपील से आगे बढ़कर अपने फैसले, खर्च और भविष्य की नीति का पूरा हिसाब देना चाहिए।
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