शेखपुरा (बिहार) से आई यह कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि सिस्टम की ज़मीनी हकीकत है। यहां एक व्यक्ति को न जेल भेजा गया, न सजा सुनाई गई—फिर भी उसने पूरे 10 साल सज़ा जैसी ज़िंदगी जी।
लक्ष्मीपुर गांव के कुंदन कुमार पर साल 2016 में सिर्फ एक आवेदन के आधार पर सरकारी तालाब पर अतिक्रमण का आरोप लगा। आरोप ऐसा कि न जमीन उनकी, न तालाब से कोई लेना-देना—लेकिन फाइल चल पड़ी, और साथ में चल पड़ा उत्पीड़न का सिलसिला।
कुंदन कभी अंचल कार्यालय के चक्कर काटते रहे, कभी जिला प्रशासन के। हर बार सबूत दिए, हर बार उम्मीद की—और हर बार सिस्टम ने कहा, “अगली तारीख़ पर आइए।”
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हालात यहां तक पहुंचे कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर उनके खेत के पास लगे पेड़ कटवा दिए गए। शिकायत की तो जवाब मिला—“यह हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।”
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सबसे हैरान करने वाली बात यह कि दोष साबित हुए बिना ही दोषी जैसा व्यवहार होता रहा। मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और सामाजिक बदनामी—तीनों की कीमत कुंदन चुका रहे थे।
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आखिरकार 2023 में हाईकोर्ट ने इस ‘फाइल-यात्रा’ पर ब्रेक लगाया और जिला पदाधिकारी से जवाब तलब किया। अब जाकर कहीं उम्मीद जगी है कि शायद सिस्टम भी सुनेगा।
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यह मामला सिर्फ कुंदन कुमार का नहीं है। यह सवाल है— क्या बिहार में एक आवेदन किसी आम आदमी की ज़िंदगी के दस साल खा सकता है? और अगर हां, तो असली अतिक्रमण किसने किया—तालाब पर या इंसाफ पर?