पटना: राजधानी पटना में बारिश ने एक बार फिर सिस्टम की सच्चाई उजागर कर दी है। जहां मरीज इलाज की उम्मीद लेकर LNJP अस्पताल पहुंचते हैं, वहीं शनिवार को उनका सामना डॉक्टरों से पहले घुटनों तक भरे गंदे पानी से हुआ। अस्पताल परिसर तालाब में तब्दील नजर आया।
“इलाज बाद में, पहले पानी पार करो…” — यह हाल था बिहार के सबसे बड़े हड्डी रोग अस्पताल LNJP का, जहां मरीजों और उनके परिजनों को हर कदम पर जूझना पड़ा।
बख्तियारपुर से आईं मालती देवी ने दर्द भरी आवाज में कहा, “पूरे अस्पताल में पानी ही पानी है। आने-जाने में इतनी परेशानी हो रही है कि इलाज से ज्यादा मुश्किल यहां पहुंचना है।”
कंधे बने सहारा, व्हीलचेयर बेकार
सबसे ज्यादा मुश्किल उन मरीजों को हुई जो चलने-फिरने में असमर्थ थे। कई जगह व्हीलचेयर पानी में फंस गईं, तो परिजनों ने मजबूरी में मरीजों को कंधे और गोद में उठाकर वार्ड तक पहुंचाया।
सोचिए… जहां स्ट्रेचर चलना चाहिए, वहां इंसान ही स्ट्रेचर बन गया!
डॉक्टरों के चेंबर तक घुसा पानी
हालात इतने खराब थे कि पानी केवल बाहर ही नहीं, बल्कि डॉक्टरों के चेंबर तक पहुंच गया। फर्श पर फिसलन, गंदा पानी और तैरता कचरा—यह दृश्य किसी अस्पताल का नहीं, बल्कि बदहाल व्यवस्था का आईना था।
इलाज के साथ ‘संक्रमण’ का खतरा
अस्पताल के भीतर गंदे पानी में तैरती गंदगी ने संक्रमण का खतरा बढ़ा दिया है। मरीज बीमारी से पहले गंदगी और जलजमाव से लड़ते नजर आए।
हर साल वही कहानी, जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है—हर साल मानसून में पटना डूबता है, अस्पताल डूबते हैं, लेकिन सिस्टम कब जागेगा?
नालों की सफाई, ड्रेनेज सिस्टम और तैयारी के दावे हर बार कागजों तक ही क्यों सीमित रह जाते हैं?
नगर निगम हरकत में, लेकिन देर से
सूचना मिलने के बाद नगर निगम की टीम पहुंची और मोटर पंप से पानी निकालने का काम शुरू किया गया। लेकिन सवाल वही—क्या हर बार राहत काम बारिश के बाद ही शुरू होगा?
शहर की रफ्तार भी थमी
अस्पताल ही नहीं, पटना के कई इलाकों—करबिगहिया, पुनाईचक, पत्थर की मस्जिद—में भी जलजमाव से यातायात प्रभावित रहा। गाड़ियां बंद पड़ी रहीं और लोग घंटों जाम में फंसे रहे।
यह सिर्फ बारिश नहीं… यह सिस्टम की पोल खोलने वाली बाढ़ है। जहां अस्पताल में मरीज इलाज नहीं, बल्कि ‘संघर्ष’ करने को मजबूर हैं।
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ब्यूरो हेड महुआ न्यूज़
बिहार /झारखण्ड