मुजफ्फरपुर: बिहार में जमीन के दाखिल-खारिज और रजिस्ट्री से जुड़ा एक मामला अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू और उनके भाई से जुड़े कथित जमीन विवाद में कांटी अंचल कार्यालय की भूमिका पुलिस जांच के केंद्र में है। करीब 35 लाख रुपये की जमीन के केवाला और दाखिल-खारिज से जुड़े इस मामले में पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि जिस जमीन के नामांतरण का आवेदन पहले खारिज कर दिया गया था, उसी जमीन का बाद में विधायक की मां के नाम दाखिल-खारिज किस आधार पर किया गया।
मामले की जांच कर रही ब्रह्मपुरा थाना पुलिस का कहना है कि उसने कांटी अंचल कार्यालय से संबंधित अभिलेख और रिपोर्ट मांगी है, लेकिन दो बार पत्राचार के बावजूद दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इससे जमीन के पुराने रिकॉर्ड और बाद में हुई नामांतरण प्रक्रिया का सत्यापन प्रभावित हो रहा है।
पहले आवेदन खारिज, फिर नामांतरण कैसे हुआ?
इस मामले में पुलिस की जांच का मुख्य सवाल जमीन के दाखिल-खारिज की प्रक्रिया को लेकर है। पुलिस यह जानना चाहती है कि जब पहले किसी व्यक्ति के नाम दाखिल-खारिज का आवेदन खारिज कर दिया गया था, तो बाद में उसी जमीन का केवाला विधायक की मां के नाम होने के बाद नामांतरण किस आधार पर किया गया।
जांच अधिकारी पुराने केवाला, पूर्व में दाखिल-खारिज के लिए दिए गए आवेदन, उसे खारिज करने के कारण और बाद में किए गए नामांतरण से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल करना चाहते हैं। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट हो सकता है कि दोनों प्रक्रियाओं में क्या अंतर था और बाद में दाखिल-खारिज किस नियम या आधार पर किया गया।
फिलहाल, अंचल कार्यालय से संबंधित रिकॉर्ड नहीं मिलने के कारण पुलिस इस प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों का पूरा सत्यापन नहीं कर सकी है।
पुलिस ने दो बार पत्र लिखा, फिर भी नहीं मिली रिपोर्ट
ब्रह्मपुरा थानाध्यक्ष सह कांड के अनुसंधानकर्ता विपिन रंजन के मुताबिक, पुलिस ने कांटी अंचल कार्यालय से दाखिल-खारिज से संबंधित दस्तावेजों की मांग की है। इसके लिए दो बार पत्राचार किया गया, लेकिन रिपोर्ट अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई।
पुलिस की जांच के लिए इन दस्तावेजों का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि जमीन के पुराने रिकॉर्ड और बाद में किए गए नामांतरण की तुलना किए बिना पूरी प्रक्रिया को समझना मुश्किल है। जांच अधिकारी यह पता लगाना चाहते हैं कि आवेदन खारिज होने के बाद परिस्थितियों में क्या बदलाव आया और नए नामांतरण को मंजूरी देने के पीछे क्या आधार था।
सीओ और आरओ की भूमिका भी जांच के दायरे में
मामले में कांटी के अंचल अधिकारी (सीओ) और राजस्व अधिकारी (आरओ) की भूमिका की भी जांच की जा रही है। पुलिस यह देखना चाहती है कि जमीन से जुड़े पुराने अभिलेखों की जानकारी होने के बावजूद बाद में नामांतरण की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई।
हालांकि, किसी अधिकारी की भूमिका की जांच होना अपने आप में उसकी संलिप्तता या दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। इस मामले में संबंधित अधिकारियों की भूमिका दस्तावेजों, नियमों और पूरी प्रक्रिया की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
एसएसपी ने भी जताई रिपोर्ट नहीं मिलने पर चिंता
मुजफ्फरपुर के एसएसपी कांतेश कुमार मिश्र ने भी अंचल कार्यालय से रिपोर्ट नहीं मिलने की बात कही है। उनके अनुसार, अनुसंधानकर्ता ने दो बार रिपोर्ट मांगी है, लेकिन अब तक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।
जांच के लिए जरूरी अभिलेख समय पर नहीं मिलने से पुलिस को जमीन के नामांतरण से जुड़ी कड़ियों को जोड़ने में परेशानी हो रही है। अब यह देखना होगा कि अंचल कार्यालय कब तक मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराता है और उनमें दर्ज जानकारी से मामले में क्या तथ्य सामने आते हैं।
35 लाख की जमीन के मामले में रिकॉर्ड ही अहम कड़ी
इस प्रकरण में जमीन के केवाला और दाखिल-खारिज से जुड़े दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इन्हीं से पता चल सकेगा कि जमीन का पूर्व में किसके नाम नामांतरण कराने का प्रयास हुआ था, आवेदन क्यों खारिज किया गया और बाद में विधायक की मां के नाम दाखिल-खारिज की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी हुई।
फिलहाल पुलिस की जांच अंचल कार्यालय से मिलने वाले अभिलेखों पर टिकी है। दस्तावेज सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि नामांतरण की प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं और इस मामले में किसी स्तर पर अनियमितता हुई थी या नहीं।
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