नालंदा: बिहारशरीफ के माता शीतला मंदिर में हुई भगदड़ ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं, लेकिन इस दर्दनाक हादसे के बाद अब सियासी बयानबाज़ी और जिम्मेदारी तय करने की बहस तेज हो गई है। सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो हर बार ऐसी घटनाओं के बाद ही सक्रिय होती है।
राजद अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. आयशा फातिमा ने इस घटना पर गहरा शोक जताते हुए कहा कि यह समय राजनीति का नहीं, बल्कि संवेदना और एकजुटता का है। उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए प्रशासन से राहत और सहयोग सुनिश्चित करने की बात कही।
वहीं समाजसेवी मो. यासिर इमाम ने भी हादसे को बेहद दुखद बताते हुए घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की और प्रशासन से बेहतर इलाज व राहत व्यवस्था की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है, ताकि भविष्य में श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
लेकिन इन बयानों के बीच बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं? क्या भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित है? क्या प्रशासन हर बार हादसे के बाद ही जागेगा?
स्थानीय लोगों के बीच भी इस बात को लेकर नाराजगी है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जाते। भीड़ नियंत्रण, निकासी व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं की कमी अक्सर ऐसी घटनाओं को जन्म देती है।
यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की तैयारी और जवाबदेही पर सीधा सवाल है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और ठोस सुधार नहीं किए जाएंगे, तब तक ‘संवेदना’ के साथ-साथ ‘सवाल’ भी उठते रहेंगे।
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नालंदा से वीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट…