किशनगंज (बिहार): किशनगंज से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो “विकास” के दावों पर सवाल भी उठाती है और सिस्टम की हकीकत भी दिखाती है। यहां शादी की खुशियों के बीच दूल्हे की एंट्री किसी फिल्मी सीन जैसी नहीं, बल्कि मजबूरी की कहानी बन गई।
शहनाई बज रही थी, बारात सज चुकी थी, लेकिन रास्ता नहीं था… और फिर जो हुआ, वो पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया।
ठाकुरगंज प्रखंड के दल्ले गांव में दूल्हा अपनी बारात के साथ ससुराल के लिए निकला, लेकिन गांव तक पहुंचने का रास्ता जैसे उसकी परीक्षा लेने पर उतर आया। पहले नदी आई… तो नाव का सहारा लेना पड़ा। फिर जहां सड़क होनी चाहिए थी, वहां कीचड़, दलदल और टूटा रास्ता मिला।
अब बारात रुके कैसे? शादी टले कैसे? बस, यहीं से शुरू हुआ असली “जुगाड़ मॉडल”…
ग्रामीणों ने दूल्हे को कंधों पर उठा लिया और फिर कीचड़ भरे रास्ते को पार कराते हुए उसे ससुराल तक पहुंचाया। कंधों पर बैठा दूल्हा, पीछे बारात… ये नजारा अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इसी गांव में 2019 में करीब 24 करोड़ रुपये की लागत से पुल बनाया गया था। लेकिन पुल तक पहुंचने के लिए एप्रोच पथ आज तक नहीं बन पाया। यानी पुल है… पर रास्ता नहीं।
ग्रामीणों के लिए यह कोई नई परेशानी नहीं है। शादी-ब्याह हो या बीमारी, हर बार उन्हें ऐसे ही जोखिम उठाकर नदी पार करनी पड़ती है। कई बार प्रदर्शन भी हुए, शिकायतें भी हुईं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला।
इस बार दूल्हे की यह “कंधों वाली एंट्री” एक शादी की कहानी से ज्यादा बन गई है—यह उस सच्चाई का आईना है, जहां कागजों पर विकास दौड़ता है, लेकिन जमीन पर लोग आज भी कंधों के सहारे जिंदगी पार कर रहे हैं।
अब सवाल यही है—क्या इस वायरल तस्वीर के बाद सिस्टम जागेगा, या फिर अगली बार भी कोई दूल्हा ऐसे ही कंधों पर सवार होकर अपनी बारात लेकर जाएगा?
ये खबर भी पढ़े: Bihar News : तेजप्रताप पर गंभीर आरोप… साजिश या सच्चाई?