राजगीर (ओ.पी. पाण्डेय): नालंदा की ऐतिहासिक धरती पर आयोजित नालंदा अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन शुक्रवार को ज्ञान, साहित्य, समाज और सिनेमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ। पूरे दिन चले छह सत्रों में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य में संवेदनाओं की अभिव्यक्ति, बिहार की पहचान बनाने में मीडिया की भूमिका, सिनेमा और समाज के संबंध तथा ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई। विशेष रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े प्रश्न इस आयोजन के प्रमुख केंद्र में रहे।

कार्यक्रम के पहले सत्र में “प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, पूर्व राष्ट्रपति के प्रेस सचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह, चिंतक मनुदास तथा विदुषी डॉ. कविता शर्मा ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा तर्क, शास्त्रार्थ और संवाद की समृद्ध परंपरा से विकसित हुई है। डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि हजारों वर्षों तक भारतीय ज्ञान मौखिक परंपरा और गुरु-शिष्य व्यवस्था के माध्यम से संरक्षित रहा, जिसने समाज को बौद्धिक रूप से समृद्ध बनाया।

दूसरे सत्र में जीवंत चित्रांकन का आयोजन किया गया, जिसका उद्घाटन किन्नर समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहीं डॉ. भारती और सलमा चौधरी ने किया। इस सत्र में कलाकारों ने अपनी कूची के माध्यम से आर्यभट्ट और आचार्य चाणक्य जैसे महान व्यक्तित्वों को कैनवास पर उकेरा। पटना कला महाविद्यालय के छात्रों ने चित्रों के माध्यम से नालंदा की बौद्धिक विरासत को जीवंत किया।

तीसरे सत्र “पेनिंग ग्रीफ: अनुभव से अभिव्यक्ति तक” में चर्चित कवयित्री डॉ. नीना वर्मा और लेखिका गगन गिल ने साहित्य में संवेदना और शोक की भूमिका पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि जीवन की पीड़ा और बिछड़ने के अनुभव कई बार रचनात्मक अभिव्यक्ति का आधार बन जाते हैं और यही संवेदना साहित्य को गहराई प्रदान करती है।

चौथे सत्र “क्षेत्रीय पहचान की ब्रांडिंग, विशेष रूप से बिहार में मीडिया की भूमिका” विषय पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और टीवी9 भारतवर्ष के डिजिटल कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ने चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि मीडिया में अक्सर बिहार को केवल नकारात्मक संदर्भों में दिखाया जाता है, जबकि राज्य की बौद्धिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाता।

महोत्सव के एक सत्र में सिनेमा और फिल्म आलोचना पर भी चर्चा हुई, जिसमें प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक भावना सोमैया और वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने अपने विचार रखे। दोनों फिल्म समीक्षक गिल्ड के सदस्य हैं, जिसमें लगभग 56 देशों के सदस्य जुड़े हैं। इस दौरान अजय ब्रह्मात्मज ने बिहार की ओर से भावना सोमैया का स्वागत किया। भावना सोमैया ने कहा कि बिहार आने का यह उनका पहला अवसर है और पटना से इतनी दूर यात्रा कर यहां आना उनके लिए खास अनुभव रहा। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि यहां उन्हें “लिट्टी-चोखा और साहित्य” दोनों का स्वाद मिला।

अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि फिल्म उद्योग में अक्सर दो फिल्में असफल होते ही किसी कलाकार को असफल मान लिया जाता है, लेकिन एक अच्छी फिल्म कलाकार को फिर से स्थापित कर सकती है। भावना सोमैया ने कहा कि किसी फिल्म का मूल्यांकन करते समय विषयवस्तु और उसका संदेश सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने यह भी कहा कि आज फिल्मों में साहित्य आधारित विषयों पर काम कम हो रहा है, क्योंकि अधिकांश लोग केवल आर्थिक लाभ पर ध्यान दे रहे हैं। उनके अनुसार सौ फिल्मों में मुश्किल से दो ही फिल्में साहित्य पर आधारित बनती हैं। उन्होंने कहा कि आज छोटे शहरों से भी बड़ी संख्या में नए फिल्म निर्माता सामने आ रहे हैं, जो नई भाषा और नए विषयों के साथ सिनेमा को समृद्ध बना रहे हैं।

महोत्सव के छठे सत्र “भाषा, क्षेत्र और ट्रांसजेंडर” में किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति और उनके अधिकारों पर गंभीर चर्चा हुई। डॉ. भारती ने कहा कि समाज अक्सर किन्नर समुदाय को हाशिये पर धकेल देता है, जिसके कारण उन्हें कई तरह की सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहीं सलमा चौधरी ने कहा कि ट्रांसजेंडर समुदाय को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों में समान भागीदारी दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि उनके प्रयासों से उत्तर प्रदेश में ऐसा शौचालय बनाया गया है जिसका उपयोग पुरुष, महिलाएँ और ट्रांसजेंडर तीनों कर सकते हैं।

वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसके सभी वर्गों को समान सम्मान और अवसर मिलें। नालंदा अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव के इन सत्रों ने ज्ञान, साहित्य, सिनेमा और सामाजिक न्याय के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए एक समावेशी समाज की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया।
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