पटना: बिहार की सियासत में बड़ा ट्विस्ट—इस साल होने वाला पंचायत चुनाव अब ‘रुककर’ नहीं, ‘बदलकर’ आएगा। अक्टूबर–नवंबर 2026 में प्रस्तावित मतदान को सरकार ने एक साल आगे खिसका दिया, यानी अब जुलाई–अगस्त 2027 में गांव-गांव चुनावी बिगुल बजेगा। वजह? 36 साल बाद पूरा पंचायत नक्शा फिर से खींचा जाएगा।
कहानी सिर्फ तारीख बदलने की नहीं है, खेल पूरा ढांचा बदलने का है। पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद—तीनों स्तरों पर नया परिसीमन होगा, वो भी 2011 की जनसंख्या के आधार पर। मतलब साफ है—जहां आबादी ज्यादा, वहां प्रतिनिधित्व भी उसी हिसाब से तय होगा। सरकार का दावा है कि इससे संतुलित प्रतिनिधित्व और सामाजिक एकरूपता आएगी, लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है—क्या यह ‘रीसेट’ सियासी गणित भी बदलेगा?
परिसीमन की घड़ी अगस्त 2026 से टिक-टिक शुरू होगी और अप्रैल 2027 तक चलेगी। इसी बीच पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी तय करने के लिए डेडिकेटेड कमीशन बनेगा, जो 2–3 महीने में रिपोर्ट देगा। रिपोर्ट के बाद ही चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी—यानी इस बार वोट से पहले ‘वोट का नक्शा’ तैयार होगा।
इधर, चुनाव टलने का सीधा असर गांव की सरकार पर दिखेगा। मौजूदा प्रतिनिधि ही अगले 9–10 महीने तक कुर्सी संभालेंगे, ताकि विकास कार्य न रुके। 2021 की तरह निरंतरता बनी रहेगी, लेकिन नई पंचायत सरकार का गठन अब देर से होगा।
पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश कहते हैं—सरकार समय पर चुनाव चाहती थी, पर तकनीकी प्रक्रियाओं ने ब्रेक लगा दिया। सवाल अब भी वही है—क्या नया परिसीमन गांव की राजनीति का चेहरा बदलेगा, या सिर्फ तारीख बदलेगी?
गांव की चौपाल से लेकर जिला मुख्यालय तक अब एक ही चर्चा—इस बार वोट नहीं, पहले पूरा खेल ही री-डिजाइन होगा!