26 दिसंबर 2001 को टाटी पुल पर बहा खून आज भी शेखपुरा की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को झकझोरता है। 23 वर्ष बाद शुक्रवार को अरियरी प्रखंड के ससबहना इंटर स्कूल मैदान में जब टाटी नरसंहार के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, तो यह आयोजन सिर्फ एक स्मृति सभा नहीं रहा, बल्कि सत्ता, व्यवस्था और सामंतवादी सोच पर तीखे सवालों का मंच बन गया।
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शहादत दिवस समारोह के मुख्य अतिथि अशोक महतो उर्फ साधु जी ने कहा कि टाटी नरसंहार किसी आपसी विवाद का नतीजा नहीं था, बल्कि यह कमजोर और पिछड़े तबकों की बढ़ती राजनीतिक हिस्सेदारी को दबाने की साजिश थी। उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 से पहले शेखपुरा में गरीब वर्ग के लोगों को न तो प्रशासन में बोलने की आज़ादी थी और न ही सत्ता में भागीदारी।
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उन्होंने बताया कि 2001 के पंचायत चुनाव में जब नवादा, शेखपुरा, लखीसराय, नालंदा और पटना जैसे जिलों में बड़ी संख्या में कमजोर तबकों के प्रतिनिधि चुनकर आए, तभी सामंतवादी ताकतों को यह स्वीकार नहीं हुआ। जिला परिषद की बैठक में अनिल महतो द्वारा गरीबों के अधिकारों की आवाज उठाने के कुछ ही घंटों बाद टाटी पुल पर आठ लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

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कार्यक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही उभरा कि 23 साल बाद भी क्या शहीदों को पूरा न्याय मिला? वक्ताओं ने कहा कि यह नरसंहार आज भी बिहार की राजनीति और प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
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अशोक महतो ने अपने संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें 2006 में गिरफ्तार कर साढ़े 17 साल तक जेल में रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सामंतवाद के खिलाफ आवाज उठाने की सजा उन्हें अपराधी बनाकर दी गई।
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वारसलीगंज की विधायिका कुमारी अनिता ने कहा कि टाटी नरसंहार का इतिहास नई पीढ़ी को जानना जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब शहादतों को भुलाया नहीं जाएगा।
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कार्यक्रम में शेखपुरा समेत आसपास के जिलों से हजारों लोग शामिल हुए। भीड़ के बीच एक ही सवाल बार-बार गूंजता रहा—
क्या सामाजिक न्याय की वह लड़ाई, जिसके लिए आठ लोगों ने जान दी, अपने मुकाम तक पहुंच सकी?
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टाटी पुल आज भी खड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वहां खून नहीं बहता, लेकिन न्याय, बराबरी और हक को लेकर सवाल आज भी उतने ही ज़िंदा हैं।






