राजगीर (ओ.पी. पाण्डेय): नालंदा अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव 2026 के तीसरे दिन राष्ट्रवाद, सिनेमा, साहित्य और समकालीन सामाजिक चुनौतियों जैसे विषयों पर कई महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए। विभिन्न क्षेत्रों के लेखकों और चिंतकों ने इन विषयों पर अपने विचार साझा किए और गहन विमर्श किया।
पहले सत्र में लेखक-चिंतक उदय माहूरकर और लेखिका लिपिका भूषण ने “क्या राष्ट्र को राष्ट्रवाद की आवश्यकता है या राष्ट्रवाद ही राष्ट्र को कमजोर बनाता है?” विषय पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्रवाद केवल एक राजनीतिक विचार नहीं बल्कि देश की संस्कृति, सुरक्षा और सामाजिक मूल्यों से जुड़ी व्यापक अवधारणा है।

चर्चा के दौरान महात्मा गांधी के सेवा मॉडल, स्वच्छता, हिंदू-मुस्लिम एकता और अहिंसा जैसे सिद्धांतों का उल्लेख किया गया। साथ ही विनायक दामोदर सावरकर के विचारों और उनके ऐतिहासिक दृष्टिकोण का भी संदर्भ दिया गया।
सत्र में इंटरनेट और ओटीटी मंचों के माध्यम से बढ़ती अश्लील सामग्री को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि इस तरह की सामग्री युवाओं और बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, इसलिए इस पर जागरूकता और नियंत्रण आवश्यक है।

दूसरे सत्र में अभिनेत्री और रंगमंच निर्देशक भाषा सुंभली तथा पटकथा लेखिका संध्या गोखले ने फिल्मों और ओटीटी मंचों की सामाजिक जिम्मेदारी पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कहानी और सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के विचारों और वास्तविकताओं को सामने लाने का एक सशक्त माध्यम भी हैं।
तीसरे सत्र में लेखक शांतनु गुप्ता और लेखिका अमी गणात्रा ने “साहित्य समाज को कैसे आकार देता है” विषय पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य समाज की सोच और मूल्यों को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण शक्ति है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में इसकी अहम भूमिका है।

कार्यक्रम के एक अन्य सत्र “संकट के समय लेखन एक प्रतिरोध” विषय पर लेखक जितेंद्र कुमार शर्मा, लेखक मृत्युंजय शर्मा और अतिरिक्त सचिव नितेश्वर कुमार ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि कठिन परिस्थितियों में साहित्य समाज की पीड़ा और संघर्षों को आवाज देता है।
इसके अलावा “समकालीन लेखन और क्षेत्रीय कथाओं का भविष्य” विषय पर आयोजित सत्र में मनोरंजन दास, सुमेधा वर्मा और नीलोत्पल मृणाल ने क्षेत्रीय साहित्य के भविष्य और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि क्षेत्रीय साहित्य समाज की वास्तविकता, संस्कृति और लोक जीवन को सामने लाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। डिजिटल माध्यमों और अनुवाद के कारण अब क्षेत्रीय साहित्य व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच रहा है।
