मुजफ्फरपुर: गांधी जयंती के अवसर पर शुक्रवार को शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा, मुजफ्फरपुर से तीन सजायाफ्ता बंदियों को रिहा किया गया। वर्षों तक जेल में रहने के बाद जब तीनों मुख्य द्वार से बाहर निकले और सामने अपने परिजनों को देखा तो भावुक हो गए। लंबे इंतजार के बाद अपनों से मिलते ही उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।
रिहा होने वालों में समस्तीपुर निवासी रामजी साह, दरभंगा निवासी सुरेंद्र मंडल और मुजफ्फरपुर निवासी राजेश्वर सहनी शामिल हैं।
शॉल-माला से सम्मान, हाथ में गीता
रिहाई से पहले जेल अधीक्षक युसूफ रिजवान ने तीनों बंदियों को शॉल और माला पहनाकर सम्मानित किया। उन्होंने बंदियों को समाज की मुख्यधारा में लौटकर नए सिरे से जीवन शुरू करने की शुभकामनाएं दीं।
जेल के मुख्य द्वार से बाहर निकलते समय तीनों को गीता की पुस्तक भी भेंट की गई। वर्षों बाद खुले वातावरण में कदम रखते हुए तीनों भावुक नजर आए।
राज्यभर के 44 बंदियों को मिली रिहाई
कारा प्रशासन के अनुसार, मुख्यमंत्री की पहल पर 65 वर्ष से अधिक उम्र के वृद्ध और गंभीर रूप से बीमार सजायाफ्ता बंदियों को मानवीय आधार पर रिहा करने का निर्णय लिया गया था।
प्रधान सचिव की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय समिति ने जिलों से प्राप्त प्रस्तावों की समीक्षा के बाद बिहार के विभिन्न जेलों से 44 सजायाफ्ता बंदियों की कारा मुक्ति का आदेश जारी किया था। इनमें मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा के ये तीन बंदी भी शामिल हैं।
रिहा किए गए 44 बंदियों में 90 वर्ष से अधिक उम्र के दो, 80 वर्ष से अधिक उम्र के आठ, 70 वर्ष से अधिक उम्र के 20, 65 वर्ष से अधिक उम्र के 13 और एक गंभीर रूप से बीमार बंदी शामिल बताया गया है।
पीड़ित परिवारों के लिए 59.41 लाख की सहायता
गांधी जयंती के अवसर पर कारा मुक्ति के साथ पीड़ित परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की पहल भी की गई। पीड़ित कल्याण न्यास के तहत मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा से जुड़े पीड़ित परिवारों के लिए 59 लाख 41 हजार 791 रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की गई है।
राज्य की 47 जेलों से प्राप्त प्रस्तावों के आधार पर 2,329 बंदियों से जुड़े 1,820 पीड़ित परिजनों के लिए कुल 3 करोड़ 86 लाख 6 हजार 627 रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
कारा प्रशासन के अनुसार, गांधी जयंती पर हुई इस पहल में एक तरफ पात्र वृद्ध और गंभीर रूप से बीमार सजायाफ्ता बंदियों को मानवीय आधार पर रिहाई मिली, वहीं दूसरी ओर पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। वर्षों बाद जेल से बाहर निकले तीनों बंदियों के लिए यह दिन परिवार से दोबारा जुड़ने और जीवन को नए सिरे से शुरू करने का भावुक मौका बन गया।
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