पटना: बिहार में लोकसभा और विधानसभा की सीटों में महिला आरक्षण लागू होने जा रहा है। मोदी सरकार 33% महिला रिजर्वेशन देने की तैयारी कर रही है, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के तहत संसद और विधानसभाओं में लागू किया जाएगा। इस कानून को लागू करने की सबसे बड़ी बाधा परिसीमन (सीटों के इलाकों का निर्धारण) है, जो जनगणना पर आधारित होती है। मोदी सरकार अब 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर इसे जल्दी लागू करना चाहती है, ताकि 2029 लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं का आरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
महिला आरक्षण लागू होने पर यह तय नहीं कि मौजूदा सीटों में ही कोटा रहेगा या सीटें बढ़ाई जाएंगी। अगर सरकार का फॉर्मूला लागू हुआ और सीटें 50% बढ़ाई गईं, तो लोकसभा की कुल सीटें 815 हो जाएंगी, जिनमें 271 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। अगर सीटें नहीं बढ़ीं तो मौजूदा 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
बिहार में बदलाव के अनुसार लोकसभा की 40 सीटें बढ़कर 60 हो जाएंगी और इनमें से 20 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व रहेंगी। विधानसभा की 243 सीटें बढ़कर 365 हो जाएंगी, जिनमें 121 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इस तरह अगले लोकसभा चुनाव 2029 में बिहार से कम से कम 20 महिला सांसद होंगी और विधानसभा चुनाव 2030 में 121 महिला विधायक होंगी।
आरक्षित सीटों का चयन लॉटरी सिस्टम या रोटेशन के माध्यम से होगा। यह हर चुनाव में बदलेगा ताकि किसी क्षेत्र के पुरुष उम्मीदवारों के अवसर स्थायी रूप से प्रभावित न हों। आरक्षित सीटें 15 साल के लिए होंगी और फिर परिसीमन के आधार पर बदलेंगी। एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सेदारी मिलेगी, जबकि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान नहीं है। सामान्य सीटों पर भी महिलाओं की उम्मीदवारी को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव है, जिससे कुल प्रतिनिधित्व 38–40% तक पहुंच सकता है।
लोकसभा और विधानसभा की सीटें बढ़ाने की तैयारी इसलिए हो रही है क्योंकि वर्तमान में सीटें 1971 की जनगणना पर फ्रीज हैं। तब देश की आबादी 55 करोड़ थी, अब लगभग 145 करोड़ है। जनसंख्या बढ़ने के कारण एक सांसद पर 20–28 लाख लोगों का बोझ आता है। संविधान के अनुसार हर जनगणना के बाद सीटों का एडजस्टमेंट होना चाहिए।
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