हाजीपुर: बिहार में सरकारी स्कूलों के संचालन समय और बच्चों की पढ़ाई को लेकर अब सियासी बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। तिरहुत स्नातक क्षेत्र के MLC बंशीधर ब्रजवासी ने स्कूलों में पढ़ाई के घंटों को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की कार्यशैली और शिक्षा विभाग की नीतियों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ब्रजवासी ने कहा कि यदि बच्चों को सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक पढ़ाया जाएगा, तो वे पढ़ाई के दबाव को कैसे झेल पाएंगे? उन्होंने यहां तक कहा कि अगर वह शिक्षा मंत्री होते, तो चार घंटे से अधिक पढ़ाई कराने पर रोक लगा देते।
ब्रजवासी के इस बयान का सबसे चर्चित हिस्सा छोटे बच्चों को लेकर उनकी टिप्पणी है। उन्होंने कहा कि कक्षा एक और दो के बच्चों को इतने लंबे समय तक पढ़ाना उचित नहीं होगा। उनके मुताबिक, चार घंटे की पढ़ाई के बाद बच्चे ही नहीं, शिक्षक भी पढ़ाने की स्थिति में नहीं रहते।
लेकिन सवाल यह है कि क्या स्कूलों में पढ़ाई का समय बढ़ाना ही शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का रास्ता है? क्या बच्चों की सीखने की क्षमता, शिक्षकों की कार्यशैली और स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है? ब्रजवासी के बयान ने इस बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।
‘चार घंटे के बाद शिक्षक मोबाइल चलाते हैं’, MLC के बयान से बढ़ी चर्चा
हाजीपुर में तिरहुत स्नातक MLC चुनाव के प्रचार के दौरान सभा को संबोधित करते हुए बंशीधर ब्रजवासी ने बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि चार घंटे पढ़ाई के बाद कुछ शिक्षक स्कूलों में बैठकर मोबाइल चलाते हैं और दूसरी गतिविधियों में लगे रहते हैं।
ब्रजवासी के इस दावे को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सभी शिक्षकों पर लागू होता है या कुछ स्कूलों में देखी गई स्थितियों को लेकर उनकी टिप्पणी है? उनके आरोपों की पुष्टि करने वाले स्वतंत्र आंकड़े या किसी विशेष स्कूल की जांच का विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया है। इसलिए इस बयान को MLC का आरोप और उनका व्यक्तिगत आकलन मानकर ही देखा जाना चाहिए।
हालांकि, उनके बयान ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही को लेकर बहस जरूर छेड़ दी है। यदि कहीं पढ़ाई के समय का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है, तो उसकी निगरानी कैसे होती है? और यदि शिक्षक निर्धारित समय में बेहतर तरीके से पढ़ा रहे हैं, तो क्या लंबे स्कूल समय को लेकर उनकी चिंताओं को भी सुना जाना चाहिए?
‘मैं शिक्षा मंत्री होता तो चार घंटे से ज्यादा पढ़ाई पर रोक लगा देता’
बंशीधर ब्रजवासी ने कहा कि वह शिक्षा मंत्री होते तो चार घंटे से ज्यादा पढ़ाई कराने पर रोक लगाने का फैसला लेते। उनका तर्क है कि बच्चों को लंबे समय तक कक्षा में बैठाने से ही बेहतर शिक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
उन्होंने लंबे स्कूल समय को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बच्चों को पहले से ही सुबह से दोपहर या शाम तक पढ़ना पड़ता है, तो समय और बढ़ाने की चर्चा क्यों हो रही है? खासकर पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के लिए इतने लंबे समय तक पढ़ाई की व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी?
यहां एक अहम सवाल यह भी है कि पढ़ाई के घंटे तय करते समय बच्चों की उम्र, पाठ्यक्रम, बीच में मिलने वाले विश्राम और पढ़ाई के परिणामों को कितनी प्राथमिकता दी जाती है। केवल स्कूल में बिताए गए समय से शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन नहीं किया जा सकता; यह भी देखना जरूरी है कि बच्चे वास्तव में कितना सीख रहे हैं।
शनिवार को हाफ-डे स्कूल: फैसले के श्रेय पर भी सियासी तकरार
बिहार के सरकारी विद्यालयों में शनिवार को आधे दिन की पढ़ाई की व्यवस्था फिर से लागू करने का मुद्दा भी इस विवाद के केंद्र में है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस व्यवस्था को बहाल करने की घोषणा की थी और शिक्षा विभाग ने इसके बाद आदेश जारी किया। छह अगस्त 2026 को जारी आदेश के मुताबिक, शनिवार को स्कूलों के संचालन का समय सुबह 9:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक निर्धारित किया गया था।
इसी मुद्दे पर शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के कथित बयान—कि वह चाहते थे कि शिक्षक बच्चों को दो घंटे और पढ़ाते—को लेकर ब्रजवासी ने निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि हाफ-डे स्कूल के फैसले का श्रेय खुद लेने और अपने अधिकारियों तथा अन्य नेताओं को देने की कोशिश की जा रही है।
ब्रजवासी का दावा है कि इस निर्णय के पीछे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पहल थी। यह उनके द्वारा लगाया गया राजनीतिक आरोप है; श्रेय लेने की मंशा को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
इस विवाद के बीच सवाल उठता है कि जब किसी फैसले का उद्देश्य विद्यार्थियों और शिक्षकों को राहत देना हो, तो राजनीतिक श्रेय की बहस कितनी जरूरी है? क्या शिक्षा से जुड़े निर्णयों पर चर्चा का केंद्र बच्चों का हित और पढ़ाई के परिणाम नहीं होने चाहिए?
शिक्षा मंत्री पर निशाना, बयान से आमने-सामने आए दो पक्ष
ब्रजवासी ने अपने संबोधन में शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी की टिप्पणी पर आपत्ति जताई और लंबे स्कूल समय को लेकर अपनी असहमति जाहिर की। उनके बयान से साफ है कि वह पढ़ाई के घंटों को बढ़ाने के विचार से सहमत नहीं हैं।
हालांकि, शिक्षा मंत्री के कथित बयान का पूरा संदर्भ और उसका आधिकारिक विवरण सामने रखे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि अतिरिक्त समय में नियमित कक्षा, अभ्यास, गतिविधियां या अन्य शैक्षणिक कार्य प्रस्तावित थे या नहीं।
विवाद के केंद्र में अब दो बड़े सवाल हैं—क्या ज्यादा समय तक स्कूल चलाने से बच्चों की पढ़ाई में सुधार होगा? और क्या कम समय में बेहतर शिक्षण सुनिश्चित करने के लिए स्कूलों की निगरानी तथा शिक्षण पद्धति को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है?
हाजीपुर में चुनाव प्रचार के दौरान दिया बयान
बंशीधर ब्रजवासी हाजीपुर में तिरहुत स्नातक MLC चुनाव के प्रचार के लिए पहुंचे थे। वह तिरहुत क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं और वर्तमान में भी स्नातक क्षेत्र के विधान पार्षद हैं। सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने शिक्षा व्यवस्था, स्कूलों के समय और शिक्षा मंत्री की टिप्पणी पर अपनी बात रखी।
चुनावी मंच से आए इस बयान ने शिक्षा से जुड़े एक नीतिगत मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। हालांकि, बयान की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बावजूद इसमें उठाए गए सवालों पर तथ्य और आंकड़ों के आधार पर चर्चा जरूरी है।
अब जवाब किससे मांगा जाए—शिक्षा विभाग से या स्कूलों से?
बंशीधर ब्रजवासी के बयान के बाद शिक्षा विभाग के सामने कई सवाल खड़े होते हैं। क्या स्कूलों में पढ़ाई के समय का नियमित मूल्यांकन किया जाता है? क्या बच्चों की उम्र के अनुसार पढ़ाई और विश्राम का संतुलन तय है? क्या शिक्षकों के कामकाज की निगरानी के साथ उनकी समस्याओं को भी समझा जाता है?
इन सवालों के जवाब किसी एक बयान से नहीं, बल्कि स्कूलों की वास्तविक स्थिति, पढ़ाई के परिणामों और विभागीय आंकड़ों से मिलने चाहिए। साथ ही, शिक्षकों के बारे में लगाए गए आरोपों की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि सभी शिक्षकों को एक ही श्रेणी में रखकर।
फिलहाल, ब्रजवासी का बयान स्कूलों के समय और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर नई बहस जरूर खड़ी करता है। अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस बहस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और बच्चों की पढ़ाई को बेहतर बनाने के लिए किन पहलुओं पर प्राथमिकता से काम किया जाता है।
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