शेखपुरा: बिहार के शेखपुरा जिले में दुर्गा पूजा के दौरान एक ऐसी अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जो करीब 300 साल पुरानी बताई जाती है। बरबीघा प्रखंड के पिजड़ी गांव में दुर्गा पूजा के अवसर पर दलित समाज की एक टोली पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ गांव में निकलती है। इस दौरान सवर्ण परिवारों के घर-घर टोली का स्वागत किया जाता है। गांव की इस परंपरा में आस्था, लोकविश्वास और सामाजिक सहभागिता की अनूठी झलक देखने को मिलती है।
इस आयोजन में टोली के आगे एक सदस्य घड़ा लेकर चलता है, जबकि अन्य सदस्य ग्रामीण परंपरा के अनुसार पारंपरिक हथियार धारण करते हैं। ‘बलि बोल’ के जयकारों के बीच टोली गांव की गलियों से गुजरती है। कई जगह ग्रामीण रास्ते में लेट जाते हैं और टोली उनके ऊपर से गुजरती है। स्थानीय मान्यता है कि ऐसा करने से बीमारियां दूर होती हैं और लोगों को शक्ति मिलती है।
घर-घर होता है स्वागत, अनाज और सहयोग राशि भी देते हैं लोग
पिजड़ी गांव में इस परंपरा के तहत दलित समाज की टोली सवर्ण परिवारों के घरों तक पहुंचती है। ग्रामीणों की ओर से टोली का स्वागत किया जाता है। इस दौरान लोग सहयोग राशि और अनाज भी देते हैं। गांव में वर्षों से निभाई जा रही इस रस्म को स्थानीय लोग अपनी पारंपरिक विरासत का हिस्सा मानते हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक, यह आयोजन दुर्गा पूजा से जुड़ी धार्मिक परंपरा के तहत किया जाता है। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद दलित टोले से टोली निकलती है और गांव में निर्धारित मार्ग से भ्रमण करती है। इस दौरान ‘बलि बोल’ के जयकारे माहौल को पारंपरिक रंग में रंग देते हैं।
रास्ते में लेट जाते हैं ग्रामीण, जुड़ी है बीमारी दूर होने की मान्यता
इस परंपरा का सबसे खास पहलू रास्ते में लेटने की रस्म है। टोली के गुजरने के दौरान कुछ ग्रामीण जमीन पर लेट जाते हैं और टोली उनके ऊपर से गुजरती है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस रस्म से रोग-दोष दूर होते हैं और परिवार को सुख-समृद्धि मिलती है।
हालांकि, यह ग्रामीण आस्था और लोकविश्वास से जुड़ी मान्यता है। इसके जरिए बीमारियां ठीक होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। फिर भी गांव के लोगों के लिए इस परंपरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बना हुआ है।
मंदिर के सामने फोड़ा जाता है घड़ा, टुकड़ों को घर ले जाते हैं ग्रामीण
टोली के भ्रमण का समापन दुर्गा मंदिर के सामने होता है। यहां टोली का नेतृत्व करने वाला सदस्य घड़ा फोड़ता है। इसके बाद घड़े के टुकड़ों को ग्रामीण अपने घरों में ले जाते हैं और मवेशियों के रहने की जगह पर रखते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, घड़े के टुकड़े शुभ माने जाते हैं और इन्हें रखने से पशुओं की रक्षा तथा परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है। यह रस्म भी पीढ़ियों से चली आ रही ग्रामीण परंपरा का हिस्सा बताई जाती है।
वर्षों से श्रवण पासवान कर रहे हैं अगुवाई
ग्रामीणों के अनुसार, इस आयोजन की अगुवाई कई वर्षों से श्रवण पासवान करते आ रहे हैं। गांव के लोग मिलकर इस परंपरा को निभाते हैं, जिसमें अलग-अलग परिवारों की भागीदारी रहती है।
पिजड़ी की यह परंपरा दुर्गा पूजा के दौरान गांव की विशिष्ट पहचान बन जाती है। घर-घर स्वागत, अनाज और सहयोग राशि देना तथा सामूहिक रूप से धार्मिक रस्मों में शामिल होना इस आयोजन के प्रमुख हिस्से हैं।
करीब 300 साल पुरानी बताई जाने वाली यह परंपरा आज भी ग्रामीण जीवन में लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत की मौजूदगी को दर्शाती है। पिजड़ी गांव में दुर्गा पूजा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके साथ जुड़ी पुरानी रस्में भी लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़े रखती हैं।
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