धनबाद: मटकुरिया गोलीकांड में अदालत का फैसला आते ही जहां एक तरफ 15 साल पुराने केस को अंजाम तक पहुंचाने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ इस फैसले ने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
झारखंड के पूर्व मंत्री मन्नान मल्लिक समेत 30 लोगों को सजा मिलने के बाद अब पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय खुलकर उनके बचाव में सामने आ गए हैं। उन्होंने न सिर्फ फैसले पर सवाल उठाए, बल्कि हेमंत सरकार से बड़ी मांग भी कर डाली है।
सुबोधकांत सहाय का कहना है कि इस केस में कई अहम तथ्य सामने ही नहीं आए। उन्होंने उस समय के डीजीपी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस फायरिंग को खुद प्रशासन ने स्वीकार किया था, लेकिन इस पहलू को गंभीरता से नहीं लिया गया।
इतना ही नहीं, उन्होंने नितिन मदन कुलकर्णी की जांच रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसे उनके अनुसार न तो कोर्ट में पेश किया गया और न ही उस पर बहस हुई। सहाय ने मांग की है कि राज्य सरकार इस रिपोर्ट को ऊपरी अदालत में रखे, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।
क्या है पूरा मामला?
27 अप्रैल 2011… धनबाद का मटकुरिया इलाका… बीसीसीएल क्वार्टर खाली कराने पहुंची पुलिस और विरोध कर रहे लोगों के बीच टकराव… और फिर चली गोलियां। इस घटना में 4 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
अब करीब डेढ़ दशक बाद कोर्ट ने 30 आरोपियों को दोषी मानते हुए 3 साल की सजा और जुर्माना सुनाया है।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते…
क्या पूरी सच्चाई सामने आई?
क्या जांच के सभी पहलुओं पर गौर किया गया?
या फिर यह मामला अभी और लंबा चलेगा?
फिलहाल इतना तय है कि मटकुरिया गोलीकांड का यह फैसला कानूनी से ज्यादा अब सियासी मुद्दा बनता जा रहा है।
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