सुपौल: बिहार के सुपौल जिले में एक ऐसा शक्तिस्थल है, जहां मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के बजाय पिंडी स्वरूप की पूजा की जाती है। यहां की आस्था का केंद्र कोई साधारण स्थान नहीं, बल्कि बेर के उस पेड़ से जुड़ी परंपरा है, जिसके नीचे पूजा-अर्चना किए जाने की मान्यता सदियों से चली आ रही है। जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर हरदी स्थान स्थित वन देवी दुर्गा मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक पहचान और पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ी लोककथा के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान रखता है।
स्थानीय मान्यता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इसी स्थान पर बेर के पेड़ के नीचे मां वन देवी की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी। हालांकि, इस मान्यता के ऐतिहासिक प्रमाण स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की आस्था में इसका विशेष महत्व है। नवरात्र आते ही यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है और पूरा परिसर भक्तिमय माहौल में डूब जाता है।
बेर के पेड़ के नीचे शुरू हुई पूजा, फिर बना भव्य मंदिर
स्थानीय लोगों के अनुसार, हरदी स्थान में पहले मां वन देवी बेर के पेड़ के नीचे पिंडी स्वरूप में विराजमान थीं। श्रद्धालु इसी स्थान पर पहुंचकर पूजा करते और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते थे। समय बीतने के साथ मां के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती गई और आसपास के गांवों में इस धार्मिक स्थल की पहचान फैलने लगी।
बढ़ती आस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कुछ वर्ष पहले यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर में मां वन देवी की पिंडी स्वरूप में पूजा-अर्चना होने लगी। लेकिन खास बात यह है कि मंदिर बनने के बाद भी बेर के पेड़ के नीचे माथा टेकने की पुरानी परंपरा कायम है। श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने के बाद पेड़ के नीचे पहुंचकर भी मां का आशीर्वाद मांगते हैं।
मां के दरबार में मुराद लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु
हरदी स्थान के वन देवी मंदिर को लेकर आसपास के लोगों में गहरी आस्था है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मां के दरबार में मांगी गई मुराद पूरी होती है। इसी विश्वास के साथ लोग परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और जीवन की परेशानियों से मुक्ति की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।
मंदिर में मां की पिंडी स्वरूप की पूजा की जाती है। श्रद्धालु माथा टेकते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं और बेर के पेड़ के नीचे भी श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करते हैं। कई परिवारों के लिए यह केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का प्रतीक है।
नवरात्र में हजारों श्रद्धालुओं की उमड़ती है भीड़
वैसे तो वन देवी मंदिर में सालभर भक्तों के आने का सिलसिला जारी रहता है, लेकिन शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष चहल-पहल रहती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, सामान्य दिनों की तुलना में नवरात्र में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है और हजारों लोग मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
दूर-दराज के गांवों से आने वाले श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहता है। इस दौरान श्रद्धालुओं की आवाजाही को व्यवस्थित रखने और दर्शन के दौरान परेशानी से बचने के लिए स्थानीय स्तर पर सहयोग भी किया जाता है।
पिंडी स्वरूप की पूजा और पुरानी परंपरा है खास पहचान
सुपौल के हरदी स्थान स्थित वन देवी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की पूजा पद्धति है। जहां अनेक दुर्गा मंदिरों में मां की प्रतिमा स्थापित की जाती है, वहीं यहां पिंडी स्वरूप में आराधना की जाती है। इसके साथ बेर के पेड़ के नीचे पूजा की परंपरा इस स्थान को अलग पहचान देती है।
पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ी लोकमान्यता, बेर के पेड़ के नीचे पूजा की परंपरा और नवरात्र में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस मंदिर को सुपौल के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शामिल करती है।
आस्था की परंपरा आज भी बरकरार
हरदी स्थान की वन देवी के दरबार में समय के साथ बदलाव जरूर आया है। बेर के पेड़ के नीचे पूजा से शुरू हुई परंपरा आज भव्य मंदिर तक पहुंच चुकी है, लेकिन श्रद्धालुओं के मन में मां के प्रति विश्वास आज भी कायम है।
यहां आने वाले भक्त मां के चरणों में शीश झुकाकर अपनी मनोकामनाएं रखते हैं। किसी के लिए यह पांडवों की स्मृतियों से जुड़ा आस्था स्थल है, तो किसी के लिए परिवार और जीवन की खुशहाली की प्रार्थना करने का स्थान। यही लोकविश्वास, परंपरा और भक्ति का संगम सुपौल की वन देवी को खास पहचान देता है।