सहरसा: जिले के महिषी प्रखंड स्थित महपुरा के संत बाबा कारू खिरहर धाम में शारदीय नवरात्र की महासप्तमी पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। बिहार के विभिन्न जिलों, कोसी-सीमांचल और पड़ोसी देश नेपाल से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा के दरबार में हजारों लीटर दूध अर्पित किया। पशुओं की मन्नत पूरी होने पर पहला दूध बाबा को चढ़ाने की परंपरा के कारण मंदिर परिसर में दूध की धारा बहती नजर आई। श्रद्धालुओं के बीच यह दृश्य मानो कोसी के दूध की नदी बन जाने जैसा रहा।

मान्यता है कि बाबा कारू खिरहर पशुधन के रक्षक हैं। पशुपालक अपने मवेशियों की सलामती, अच्छी सेहत और बीमारी से मुक्ति के लिए बाबा से मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर वे अपने पशुओं का पहला दूध लेकर धाम पहुंचते हैं और उसे बाबा को अर्पित करते हैं। महासप्तमी के अवसर पर यह परंपरा विशेष रूप से निभाई जाती है, जिसके कारण धाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।
धाम में चढ़ाए गए दूध से बड़े पैमाने पर खीर महाप्रसाद तैयार किया जाता है। बाद में इसे श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता है। बाबा के दरबार में मिलने वाली भभूति को लेकर भी भक्तों में गहरी आस्था है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भभूति लगाने से पशुओं की बीमारियों में राहत मिलती है।

पुजारी उपेंद्र खिरहर ने बताया कि महासप्तमी के दिन बाबा को दूध अर्पित करने के लिए दूर-दूर से पशुपालक पहुंचते हैं। चढ़ावे के दूध से खीर तैयार कर भक्तों के बीच बांटी जाती है। यह परंपरा बाबा के प्रति लोगों की अटूट आस्था और धाम की विशिष्ट पहचान को दर्शाती है।
श्रद्धालुओं ने बताया कि बिहार और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों से लोग बाबा के दर्शन करने तथा दूध चढ़ाने पहुंचते हैं। पशुओं की मन्नत पूरी होने पर दूध अर्पित करना उनकी पुरानी परंपरा है। उनके लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है।

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। सदर एसडीपीओ पंकज कुमार सिंह के अनुसार, धाम में पुलिस पदाधिकारियों, जवानों और दंडाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई है। प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं को दर्शन करने और प्रसाद प्राप्त करने में किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए सतर्कता बरती गई।
बाबा कारू खिरहर धाम कोसी क्षेत्र में पशुधन की रक्षा से जुड़ी लोकआस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। महासप्तमी पर यहां उमड़ने वाली भीड़ और दूध अर्पित करने की अनूठी परंपरा इस धाम की धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाती है। बाबा के दरबार में दूध चढ़ाने पहुंचे पशुपालकों की आस्था ने एक बार फिर कोसी की धरती पर ऐसा दृश्य रचा, जिसे श्रद्धालु ‘दूध की नदी’ के रूप में याद करते हैं।
ये खबर भी पढ़े: कहीं तिलचट्टे तो कहीं पांच हजार बोतलों का मंदिर, कटिहार के 6 पंडाल देखकर रह जाएंगे हैरान!