Bihar News : राजा दशरथ की तपोभूमि श्रृंगीऋषि आश्रम, जहां जन्मी रामकथा की नींव!
लखीसराय जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर, चानन और सूर्यगढ़ा प्रखंड की सीमा पर स्थित श्रृंगीऋषि आश्रम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की वह तपोभूमि है, जहां से रामकथा की आधारशिला रखी गई। पहाड़ों, घाटियों, घने जंगलों, छोटी नदियों और दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह धाम आज भी अपने अलौकिक वातावरण से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अयोध्या नरेश राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर इसी श्रृंगीऋषि आश्रम पहुंचे थे। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और दुर्गम रास्तों को पार कर राजा दशरथ यहां पहुंचे और ऋषि श्रृंगी के मार्गदर्शन में पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न कराया। इसी यज्ञ के प्रताप से उन्हें भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई।
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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस पावन स्थल का उल्लेख करते हुए लिखा है—
“श्रृंगीऋषि वशिष्ठ बुलावा,
पुत्र हेतु लगे यज्ञ करावा।”
युवा कवि एवं साहित्यकार डॉ. एस.पी. चीड़ीमार ने अपनी चर्चित पुस्तक “युवा वर्ग: समस्या और समाधान” में श्रृंगीऋषि धाम और जलप्पा स्थान के पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने उल्लेख किया है कि श्रृंगीऋषि, लोमश ऋषि के पुत्र थे और तप, साधना व संयम के कारण उन्हें सर्वजनीन संत का स्थान प्राप्त हुआ।
इतिहास बताता है कि राजा दशरथ पुत्रों के जन्म के बाद पुनः श्रृंगीऋषि आश्रम आए और यहीं श्रीराम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न का मुंडन संस्कार कराया। यह तथ्य इस धाम को और भी विशेष बना देता है।
श्रृंगीऋषि आश्रम आज भी प्राकृतिक रूप से अत्यंत दुर्गम है। पर्वत की कंदराओं में स्थित यह स्थल सूरज की किरणों से भी दिन के अधिकांश समय वंचित रहता है। जंगली जानवरों की आवाजाही, घने जंगल और कठिन चढ़ाई श्रद्धालुओं की आस्था की परीक्षा लेते हैं। बावजूद इसके, श्रद्धालु बिना दर्शन किए लौटने की कल्पना भी नहीं करते।
अब यह पुण्यभूमि एक बार फिर ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनने जा रही है। 3 से 11 जनवरी 2026 तक अशोकधाम मंदिर परिसर में विश्वविख्यात रामकथा वाचक श्री मोरारजी बापू द्वारा श्रृंगीऋषि आश्रम पर आधारित नौ दिवसीय श्रीराम कथा का वाचन किया जाएगा। यह आयोजन न केवल लखीसराय बल्कि संपूर्ण बिहार के लिए गौरव का विषय है।
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श्रृंगीऋषि आश्रम आज भी अपने भीतर इतिहास, आध्यात्मिक ऊर्जा और लोक आस्था की अमिट धरोहर को संजोए खड़ा है—जहां रामकथा केवल सुनी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है।

लखीसराय से कृष्णदेव की विशेष रिपोर्ट






