लखीसराय: कला, संस्कृति और सिनेमा को समर्पित संस्था सिनेयात्रा द्वारा लखीसराय संग्रहालय में आयोजित त्रिदिवसीय कार्यक्रम ‘बिहार की सिनेयात्रा: रजतपट की विरासत’ के दूसरे दिन इतिहास ने फिर से परदे पर दस्तक दी। भारत की पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मैइया तोहे पियरी चढ़ाईबो का विशेष प्रदर्शन किया गया।

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22 फरवरी 1963 को पटना के वीणा सिनेमा में रिलीज़ हुई इस ऐतिहासिक फिल्म को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक जुटे। सामाजिक कुरीतियों पर आधारित इस फिल्म ने सभागार को भावनाओं से भर दिया। कई दर्शक पहली बार बड़े पर्दे पर इस विरासत को देखकर भावुक हो उठे।
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फिल्म के निर्देशक कुंदन कुमार थे, जबकि कथा-पटकथा लेखक एवं निर्माण के सूत्रधार नाज़िर हुसैन रहे। मुख्य भूमिकाओं में असीम कुमार, कुमकुम और पद्म खन्ना नजर आए। गीत शैलेंद्र के थे, संगीत चित्रगुप्त ने दिया और स्वरों में लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर तथा मोहम्मद रफ़ी की मधुर आवाज़ शामिल रही।

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प्रदर्शन से पूर्व जिलाधिकारी मिथिलेश मिश्र ने समाहरणालय कर्मियों को संबोधित करते हुए खेल और कला गतिविधियों में भागीदारी का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को कम से कम तीन खेल और तीन कला विधाओं से जुड़ना चाहिए, जिससे कामकाजी तनाव कम करने में मदद मिलती है।
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कार्यक्रम के दौरान सिनेयात्रा के सचिव एवं फिल्मकार रविराज पटेल ने फिल्म की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और निर्माण से जुड़ी रोचक जानकारियां साझा कीं। पटना के रीजेंट सिनेमा के मालिक सुमन सिन्हा और जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह संग्रहालय अध्यक्ष मृणाल रंजन ने भी विचार रखे।

अशोक धाम ट्रस्ट के सचिव डॉ. कुमार अमित, गृह विभाग के वरीय अधिकारी राजेश वर्मा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम ने साबित किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज भी है।
