मुजफ्फरपुर: बिहार विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीटों पर चुनाव से पहले एक वायरल वीडियो ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। वीडियो में एक महिला प्लास्टिक के कवर से ‘दुर्गा सप्तशती’ की किताब निकालती दिखती है। इसके बाद किताब के अंदर रखे एक पर्चे और सफेद लिफाफे को खोला जाता है। लिफाफे में ₹500 के नोट दिखाई देते हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, लिफाफे में ₹500 के दस नोट यानी कुल ₹5,000 थे। वीडियो में दिख रहे पर्चे पर ‘मत पत्र का नमूना’ और ‘तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव’ लिखा बताया गया है। उसमें नरेंद्र प्रसाद सिंह का नाम और भारतीय जनता पार्टी का नाम भी दिखाई देने की बात कही गई है।
लेकिन इस वायरल वीडियो को लेकर सबसे अहम बात यह है कि नवभारत टाइम्स ऑनलाइन ने भी वीडियो की पुष्टि नहीं की है। ऐसे में अभी यह साबित नहीं हुआ है कि रकम वास्तव में वोट के बदले दी गई थी, वीडियो हालिया है या नहीं, और इस पूरे मामले में किसकी भूमिका है।
धार्मिक किताब के अंदर कैश! आखिर वायरल वीडियो में क्या दिखा?
वीडियो में एक महिला पहले प्लास्टिक के कवर से ‘दुर्गा सप्तशती’ की किताब निकालती नजर आती है। इसके बाद वह किताब के अंदर रखा एक पर्चा खोलती है, जिस पर चुनाव से संबंधित विवरण दिखाई देने की बात कही गई है।
फिर महिला एक सफेद लिफाफा खोलती है। रिपोर्ट के अनुसार, उसमें ₹500 के दस नोट थे। इस तरह वीडियो में दिखाई गई रकम ₹5,000 बताई गई है।
यही दृश्य सोशल मीडिया पर चर्चा की वजह बना हुआ है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या चुनाव से पहले मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नकदी पहुंचाई जा रही है? या फिर वीडियो के पीछे कोई दूसरा संदर्भ है, जिसकी अभी जानकारी सामने नहीं आई है?
इन सवालों का जवाब केवल वीडियो देखकर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए वीडियो की तारीख, स्थान, उसमें मौजूद लोगों की पहचान और रकम दिए जाने के कथित उद्देश्य की जांच जरूरी है।
नरेंद्र प्रसाद सिंह का नाम सामने आने से बढ़ी चर्चा
वायरल वीडियो में दिखाए गए पर्चे पर नरेंद्र प्रसाद सिंह का नाम और भाजपा का नाम होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। इसी वजह से वीडियो को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हुई है।
हालांकि, किसी पर्चे पर उम्मीदवार या पार्टी का नाम दिखाई देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित उम्मीदवार या पार्टी ने नकदी बांटने का निर्देश दिया था। इस मामले में किसी उम्मीदवार या राजनीतिक दल की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
इसलिए पूरे मामले में निष्कर्ष निकालने से पहले जांच एजेंसियों और चुनाव अधिकारियों की आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है।
सोशल मीडिया पर चुनावी व्यवस्था को लेकर सवाल
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने चुनाव में कथित तौर पर पैसे और उपहार बांटे जाने को लेकर सवाल उठाए। रिपोर्ट में कुछ यूजर्स की टिप्पणियों का भी जिक्र है, जिनमें अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों पर मतदाताओं को लुभाने के आरोप लगाए गए हैं।
लेकिन सोशल मीडिया पर किए गए दावे अपने आप में प्रमाण नहीं होते। किसी भी दल, उम्मीदवार या व्यक्ति पर आरोप की पुष्टि के लिए स्वतंत्र साक्ष्य और निष्पक्ष जांच जरूरी है।
इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—अगर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नकदी बांटे जाने की पुष्टि होती है, तो चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या कार्रवाई होगी?
आचार संहिता के बीच चुनाव आयोग की भूमिका अहम
चुनाव के दौरान मतदाताओं को रिश्वत या अनुचित लाभ देकर प्रभावित करने के आरोप गंभीर होते हैं। यदि वायरल वीडियो में दिखाई गई गतिविधि चुनाव में वोट के बदले नकदी देने से संबंधित साबित होती है, तो संबंधित चुनावी नियमों के तहत कार्रवाई का सवाल उठ सकता है।
फिलहाल, वीडियो की तारीख और स्थान स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए इसे मौजूदा चुनाव में हुई घटना मान लेना भी जल्दबाजी होगी। चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों की ओर से वीडियो की जांच या इस पर किसी आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि सामने आने पर ही स्थिति स्पष्ट होगी।
23 अक्टूबर की वोटिंग से पहले बड़ा सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान 23 अक्टूबर 2026 को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक निर्धारित था। इन सीटों पर एनडीए के अलावा आरजेडी और जन सुराज के उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में बताए गए हैं।
ऐसे समय में नकदी से जुड़े कथित वीडियो का वायरल होना चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है। मगर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह तय करना जरूरी है कि वीडियो वास्तविक, हालिया और इसी चुनाव से संबंधित है या नहीं।
अब सबसे अहम सवाल हैं: वीडियो किस जगह का है? इसे कब बनाया गया? क्या कथित नकदी वितरण का चुनाव से सीधा संबंध है? और क्या चुनाव अधिकारियों ने इसकी जांच शुरू की है?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला वास्तव में चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन का है या वायरल वीडियो के संदर्भ में कुछ और तथ्य हैं। फिलहाल, यह वीडियो आरोपों और सवालों के केंद्र में है—लेकिन आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है।
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