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गुलाम भारत में शुरू हुई थी चंपारण की पहली दुर्गा पूजा, आज भी बंगाल से आते हैं मूर्तिकार और ढाकी; स्वर्ण आभूषणों से होता है मां का श्रृंगार!

मोतिहारी: ढाक की गूंज, शंखध्वनि, उलुध्वनि, धूनोची नृत्य और मां दुर्गा का स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगार… यह दृश्य किसी कोलकाता...

मोतिहारी: ढाक की गूंज, शंखध्वनि, उलुध्वनि, धूनोची नृत्य और मां दुर्गा का स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगार… यह दृश्य किसी कोलकाता का नहीं, बल्कि बिहार के मोतिहारी का है। ज्ञानबाबू चौक स्थित भवानी मंडप दुर्गा पूजा इस वर्ष अपने 115वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। यह सिर्फ एक पूजा पंडाल नहीं, बल्कि चंपारण की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत इतिहास है, जिसकी शुरुआत गुलाम भारत में बंगाली समाज ने अपनी पहचान बचाने के लिए की थी।

आज भी यहां षष्ठी के दिन देवी बोधन से लेकर दशमी के सिंदूर खेला तक हर रस्म बंगाल की परंपरा के अनुसार निभाई जाती है। यही वजह है कि भवानी मंडप को चंपारण की सबसे प्राचीन और अनूठी दुर्गा पूजा के रूप में जाना जाता है।

जब बिहार बना अलग राज्य, तब शुरू हुई आस्था की नई कहानी

साल 1912… यही वह दौर था जब बंगाल से अलग होकर बिहार एक नया राज्य बना था। उस समय चंपारण में बसे कुछ बंगाली परिवारों ने अपने सांस्कृतिक अस्तित्व को जीवित रखने का संकल्प लिया। उन्होंने मोतिहारी निवासी यादव लाल शाह के प्रांगण में पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन किया।

पहले वर्ष की पूजा संपन्न कराने के लिए बनारस से भट्टाचार्य पुरोहितों को बुलाया गया। यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर चंपारण की सबसे ऐतिहासिक दुर्गा पूजा बन गई।

देशबंधु चितरंजन दास की मदद से मिला स्थायी ठिकाना

शुरुआती लगभग एक दशक तक यह पूजा शहर के अलग-अलग स्थानों पर होती रही। इसी दौरान नीलहे आंदोलन के समय देशबंधु चितरंजन दास का मोतिहारी आगमन हुआ। उन्होंने बंगाली समाज को आर्थिक सहयोग दिया, जिससे पूजा की परंपरा को नई मजबूती मिली।

इसके बाद अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू. एस. इरविन की पहल पर ज्ञानबाबू चौक स्थित स्थान बंगाली समाज को उपलब्ध कराया गया। वर्ष 1922 से भवानी मंडप में दुर्गा पूजा स्थायी रूप से शुरू हुई और तब से यह सिलसिला लगातार जारी है।

भूकंप ने तोड़ा मंडप, लेकिन नहीं टूटी आस्था

साल 1934 के विनाशकारी भूकंप में भवानी मंडप क्षतिग्रस्त हो गया। लेकिन स्थानीय लोगों और बंगाली समाज के सहयोग से इसका पुनर्निर्माण किया गया। आजादी के बाद यह स्थल केवल पूजा का केंद्र नहीं रहा, बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख मंच बन गया।

यहीं स्थित वीणापाणि लाइब्रेरी ने भी वर्षों तक साहित्य और संस्कृति की विरासत को संजोए रखा। 1960 के दशक तक भवानी मंडप मोतिहारी का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था।

जहां ढाक की ताल पर थिरकता है पूरा चंपारण

भवानी मंडप की सबसे बड़ी पहचान इसकी पारंपरिक बंगाली पूजा पद्धति है। यहां संध्या आरती के समय ढाक की गूंज के बीच धूनोची नृत्य का अद्भुत दृश्य श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देता है।

मोतिहारी में जन्मे कलाकार विश्वजीत मुखर्जी समेत स्थानीय कलाकार इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। आरती के बाद होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम आज भी इस पूजा की विशेष पहचान हैं।

स्वर्ण आभूषणों से सजती हैं मां, बंगाल से आते हैं मूर्तिकार

भवानी मंडप चंपारण का शायद इकलौता ऐसा पूजा स्थल है, जहां मां दुर्गा का श्रृंगार स्वर्ण आभूषणों से किया जाता है। प्रतिमा बनाने वाले मूर्तिकार और ढाक बजाने वाले कलाकार विशेष रूप से पश्चिम बंगाल से बुलाए जाते हैं।

पूजा के दौरान प्रतिदिन श्रद्धालुओं को भोग वितरित किया जाता है। षष्ठी के दिन बंगाली समाज के लोग अपने हाथों से मां की प्रतिमा को बेदी पर स्थापित करते हैं। इसके बाद प्राण प्रतिष्ठा, सप्तमी, अष्टमी की संधि पूजा, नवमी और दशमी के सिंदूर खेला तक हर परंपरा उसी श्रद्धा से निभाई जाती है, जैसी बंगाल में देखने को मिलती है।

बदलते समय में घटे बंगाली परिवार, लेकिन नहीं टूटी परंपरा

समय के साथ बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में कई बंगाली परिवार मोतिहारी छोड़कर दूसरे शहरों में बस गए। आज यहां गिने-चुने परिवार ही बचे हैं, लेकिन उनकी कोशिश है कि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे।

आज गैर-बांग्ला भाषी कलाकार भी रविंद्र संगीत प्रस्तुत करते हैं और युवा पीढ़ी ढाक की ताल पर परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

115 वर्षों की विरासत आज भी है जीवंत

इस वर्ष भवानी मंडप दुर्गा पूजा अपने 115वें वर्ष का आयोजन कर रही है। बंगाली इंस्टीट्यूट भवानी मंडप के अध्यक्ष डॉ. भास्कर राय, सचिव डॉ. अजीत कुमार, पूजा समिति के संयोजक मणीन्द्रनाथ दास और सहसचिव असीम मुखर्जी इस ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

एक सदी से भी अधिक समय से यह पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मोतिहारी की सांस्कृतिक पहचान, बंगाली विरासत और चंपारण के गौरव का प्रतीक बनी हुई है।

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Mahuaa News

Author at mahuaanews.com
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